सुभाषित वचन

Subhashit Vachan

काक: चेष्टा, बको ध्यानं, श्वान निद्रा तथैव च।
अल्पाहारी, गृहत्यागी, विद्यार्थी पंचलक्षणम् ॥

एक विद्यार्थी मे यह पांच लक्षण होने चाहिए, कौवे की तरह जानने की चेष्टा, बगुले की तरह ध्यान, कुत्ते की तरह सोना / निंद्रा, अल्पाहारी, आवश्यकतानुसार खाने वाला और गृह-त्यागी होना चाहिए।


सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयात ब्रूयान्नब्रूयात् सत्यंप्रियम्।
प्रियं च नानृतम् ब्रुयादेषः धर्मः सनातनः॥

आशय…सत्य कहो किन्तु सभी को प्रिय लगने वाला सत्य ही कहो, उस सत्य को मत कहो जो सर्वजन के लिए हानिप्रद है, (इसी प्रकार से) उस झूठ को भी मत कहो जो सर्वजन को प्रिय हो, यही सनातन धर्म है।


अपि स्वर्णमयी लंका न मे लक्ष्मण रोचते।
जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी॥

(वाल्मीकि रामायण)

आशय…हे लक्ष्मण! सोने की लंका भी मुझे नहीं रुचती। मुझे तो माता और मातृभूमि स्वर्ग से भी अधिक प्रिय है।


मरणानतानि वैराणि निवृत्तं नः प्रयोजनम्।
क्रियतामस्य संसकारो ममापेष्य यथा तव॥

(वाल्मीकि रामायण)

आशय…किसी की मृत्यु हो जाने के बाद उससे बैर समाप्त हो जाता है, मुझे अब इस (रावण) से कुछ भी प्रयोजन नहीं है। अतः तुम अब इसका विधिवत अन्तिम संस्कार करो।


काव्यशास्त्रविनोदेन कालो गच्छति धीमताम।
व्यसनेन च मूर्खाणां निद्रया कलहेन वा॥

आशय…बुद्धिमान व्यक्ति काव्य, शास्त्र आदि का पठन करके अपना मनोविनोद करते हुए समय को व्यतीत करता है और मूर्ख सोकर या कलह करके समय बिताता है।


तैलाद् रक्षेत् जलाद् रक्षेत् रक्षेत् शिथिल बंधनात्।
मूर्ख हस्ते न दातव्यं एवं वदति पुस्तकम्॥

आशय…एक पुस्तक कहता है कि मेरी तेल से रक्षा करो (तेल पुस्तक में दाग छोड़ देता है), मेरी जल से रक्षा करो (पानी पुस्तक को नष्ट कर देता है), मेरी शिथिल बंधन से रक्षा करो (ठीक से बंधे न होने पर पुस्तक के पृष्ठ बिखर जाते हैं) और मुझे कभी किसी मूर्ख के हाथों में मत सौंपो।


श्रोतं श्रुतनैव न तु कुण्डलेन दानेन पार्णिन तु कंकणेन।
विभाति कायः करुणापराणाम् परोपकारैर्न तु चंदनेन॥

आशय…कान की शोभा कुण्डल से नहीं बल्कि ज्ञानवर्धक वचन सुनने से है, हाथ की शोभा कंकण से नहीं बल्कि दान देने से है और काया (शरीर) चन्दन के लेप से दिव्य नहीं होता बल्कि परोपकार करने से दिव्य होता है।


भाषासु मुख्या मधुरा दिव्या गीर्वाणभारती।
तस्यां हि काव्यं मधुरं तस्मादपि सुभाषितम्॥

आशय…भाषाओं में सर्वाधिक मधुर भाषा गीर्वाणभारती अर्थात देवभाषा (संस्कृत) है, संस्कृत साहित्य में सर्वाधिक मधुर काव्य हैं और काव्यों में सर्वाधिक मधुर सुभाषित हैं।


उदारस्य तृणं वित्तं शूरस्त मरणं तृणम्।
विरक्तस्य तृणं भार्या निस्पृहस्य तृणं जगत्॥

आशय…उदार मनुष्य के लिए धन तृण के समान है, शूरवीर के लिए मृत्यु तृण के समान है, विरक्त के लिए भार्या तृण के समान है और निस्पृह (कामनाओं से रहित) मनुष्य के लिए यह जगत् तृण के समान है।


विद्वत्वं च नृपत्वं च नैव तुल्यं कदाचन्।
स्वदेशे पूज्यते राजा विद्वान सर्वत्र पूज्यते॥

आशय…राजत्व प्राप्ति और विद्वत्व प्राप्ति की किंचित मात्र भी तुलना नहीं हो सकती क्योंकि राजा की पूजा केवल उसके अपने देश में ही होती है जबकि विद्वान की पूजा सर्वत्र (पूरे विश्व में) होती है।


दुर्जनेन समं सख्यं प्रीतिं चापि न कारयेत्।
उष्णो दहति चांगारः शीतः कृष्णायते करम्॥

आशय…दुर्जन, जो कि कोयले के समान होते हैं, से प्रीति कभी नहीं करना चाहिए क्योंकि कोयला यदि गरम हो तो जला देता है और शीतल होने पर भी अंग को काला कर देता है।


चिन्तनीया हि विपदां आदावेव प्रतिक्रिया।
न कूपखननं युक्तं प्रदीप्त वान्हिना गृहे॥

आशय…जिस प्रकार से घर में आग लग जाने पर कुँआ खोदना आरम्भ करना युक्तिपूर्ण (सही) कार्य नहीं है उसी प्रकार से विपत्ति के आ जाने पर चिन्तित होना भी उपयुक्त कार्य नहीं है। (किसी भी प्रकार की विपत्ति से निबटने के लिए सदैव तत्पर रहना चाहिए।)


उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्यणि न मनोरथैः।
न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मगाः॥

आशय…जिस प्रकार से सोये हुए सिंह के मुख में मृग स्वयं नहीं चले जाते, सिंह को क्षुधा-शान्ति के लिए शिकार करना ही पड़ता है, उसी प्रकार से किसी कार्य की मात्र इच्छा कर लेने से वह कार्य सिद्ध नहीं हो जाता, कार्य उद्यम करने से ही सिद्ध होता है।


स्थानभ्रष्टाः न शोभन्ते दन्ताः केशाः नखा नराः।
इति विज्ञाय मतिमान् स्वस्थानं न परित्यजेत्॥

आशय…यदि मनुष्य के दांत, केश, नख इत्यादि अपना स्थान त्याग कर दूसरे स्थान पर चले जाएँ तो वे कदापि शोभा नहीं नहीं देंगे (अर्थात् मनुष्य की काया विकृति प्रतीत होने लगेगी)। इसी प्रकार से विज्ञजन के मतानुसार किसी व्यक्ति को स्वस्थान (अपना गुण, सत्कार्य इत्यादि) का त्याग नहीं करना चाहिए।


अलसस्य कुतो विद्या अविद्यस्य कुतो धनम्।
अधनस्य कुतो मित्रं अमित्रस्य कुतो सुखम्॥

आशय…आलसी को विद्या कहाँ? (आलसी व्यक्ति विद्या प्राप्ति नहीं कर सकता।) विद्याहीन को धन कहाँ? (विद्याहीन व्यक्ति धन नहीं कमा सकता।) धनहीन को मित्र कहाँ? (धन के बिना मित्र की प्राप्ति नहीं हो सकती।) मित्रहीन को सुख कहाँ? (मित्र के बिना सुख की प्राप्ति नहीं हो सकती।)


उदये सविता रक्तो रक्तशचास्तमये तथा।
सम्पत्तौ च विपत्तौ च महामेकरूपता॥

(महाभारत)

आशय…जिस प्रकार से सूर्य सुबह उगते तथा शाम को अस्त होते समय दोनों ही समय में लाल रंग का होता है (अर्थात् दोनों ही संधिकालों में एक समान रहता है), उसी प्रकार महान लोग अपने अच्छे और बुरे दोनों ही समय में एक जैसे एक समान (धीर बने) रहते हैं।


शान्तितुल्यं तपो नास्ति तोषान्न परमं सुखम्।
नास्ति तृष्णापरो व्याधिर्न च धर्मो दयापरः॥

आशय…शान्ति जैसा कोई तप (यहाँ तप का अर्थ उपलब्धि समझना चाहिए) नहीं है, सन्तोष जैसा कोई सुख नहीं है (कहा भी गया है “संतोषी सदा सुखी), कामना जैसी कोई ब्याधि नहीं है और दया जैसा कोई धर्म नहीं है।


सर्वोपनिषदो गावः दोग्धाः गोपालनन्दनः।
पार्थो वत्सः सुधीः भोक्ता दुग्धं गीतामृतं महत्॥

आशय…समस्त उपनिषद गाय हैं, श्री कृष्ण उन गायों के रखवाले हैं, पार्थ (अर्जुन) बछड़ा है जो उनके दूध का पान करता है और गीतामृत ही उनका दूध है। (अर्थात् समस्त उपनिषदों का सार गीता ही है।)


हंसो शुक्लः बको शुक्लः को भेदो बकहंसयो।
नीरक्षीरविवेके तु हंसो हंसः बको बकः॥

आशय…हंस भी सफेद रंग का होता है और बगुला भी सफेद रंग का ही होता है फिर दोनों में क्या भेद (अन्तर) है? जिसमें दूध और पानी अलग कर देने का विवेक होता है वही हंस होता है और विवेकहीन बगुला बगुला ही होता है।


काको कृष्णः पिको कृष्णः को भेदो पिककाकयो।
वसन्तकाले संप्राप्ते काको काकः पिको पिकः॥

आशय…कोयल भी काले रंग की होती है और कौवा भी काले रंग का ही होता है फिर दोनों में क्या भेद (अन्तर) है? वसन्त ऋतु के आगमन होते ही पता चल जाता है कि कोयल कोयल होती है और कौवा कौवा होता है।


न चौर्यहार्यं न च राजहार्यं न भ्रातृभाज्यं न च भारकारि।
व्यये कृते वर्धत व नित्यं विद्याधनं सर्वधनप्रधानम॥

आशय…न तो इसे चोर चुरा सकता है, न ही राजा इसे ले सकता है, न ही भाई इसका बँटवारा कर सकता है और न ही इसका कंधे पर बोझ होता है; इसे खर्च करने पर सदा इसकी वृद्धि होती है, ऐसा विद्याधन सभी धनों में प्रधान है।


हर्तृ र्न गोचरं याति दत्ता भवति विस्तृता।
कल्पान्तेऽपि न या नश्येत् किमन्यद्विद्यया विना॥

आशय…जो चोरों दिखाई नहीं पड़ता, किसी को देने से जिसका विस्तार होता है, प्रलय काल में भी जिसका विनाश नहीं होता, विद्या के अतिरिक्त ऐसा अन्य कौन सा द्रव्य है?


विद्या नाम नरस्य कीर्तिर्तुला भाग्यक्षये चाश्रयो।
धेनुः कामदुधा रतिश्च विरहे नेत्रं तृतीयं च सा॥
सत्कारायतनं कुलस्य महिमा रत्नैर्विना भूषणम्।
तस्मादन्यमुपेक्ष्य सर्वविषयं विद्याधिकारं कुरु॥

आशय…विद्या मनुष्य की अनुपम कीर्ति है, भाग्य का नाश होने पर वह आश्रय देती है, विद्या कामधेनु है, विरह में रति समान है, विद्या ही तीसरा नेत्र है, सत्कार का मंदिर है, कुल की महिमा है, बिना रत्न का आभूषण है; इस लिए अन्य सब विषयों को छोडकर विद्या का अधिकारी बन!


विद्यां ददाति विनयं विनयाद् याति पात्रताम्।
पात्रत्वात् धनमाप्नोति धनात् धर्मं ततः सुखम्॥

आशय…विद्या विनय देती है; विनय से पात्रता प्राप्त होती है, पात्रता से धन प्राप्त होता है, धन से धर्म की प्राप्ति होती है, और धर्म से सुख प्राप्त होता है।


विद्याविनयोपेतो हरति न चेतांसि कस्य मनुजस्य।
कांचनमणिसंयोगो नो जनयति कस्य लोचनानन्दम्॥

आशय…विद्यावान और विनयी पुरुष किस मनुष्य के चित्त को नहीं हरते? सुवर्ण और मणि का संयोग किसकी आँखों को सुख नहि देता? (अर्थात् विद्या और विनय का संयोग सोने और मणि के संयोग के समान है।)


विद्या रूपं कुरूपाणां क्षमा रूपं तपस्विनाम्।
कोकिलानां स्वरो रूपं स्त्रीणां रूपं पतिव्रतम्॥

आशय…कुरुप का रुप विद्या है, तपस्वी का रुप क्षमा है, कोकिला का रुप स्वर है, और स्त्री का रुप पातिव्रत्य है ।


कुत्र विधेयो यत्नः विद्याभ्यासे सदौषधे दाने।
अवधीरणा क्व कार्या खलपरयोषित्परधनेषु॥

आशय…यत्न किस के लिए करना चाहिए? विद्याभ्यास, सदौषध और परोपकार के लिए। अनादर किसका करना ? दुर्जन, परायी स्त्री और परधन का।


रूपयौवनसंपन्ना विशाल कुलसम्भवाः।
विद्याहीना न शोभन्ते निर्गन्धा इव किंशुकाः॥

आशय…रुपसम्पन्न, यौवनसम्पन्न और विशाल कुल में उत्पन्न व्यक्ति भी विद्याहीन होने पर, सुगंधरहित केसुड़े के फूल की भाँति, शोभा नहीं देता।


माता शत्रुः पिता वैरी येन बालो न पाठितः।
न शोभते सभामध्ये हंसमध्ये बको यथा॥

आशय…अपने बालक को न पढ़ाने वाले माता व पिता अपने ही बालक के शत्रु हैं, क्योंकि हंसो के बीच बगुले की भाँति, विद्याहीन मनुष्य विद्वानों की सभा में शोभा नहीं देता।


दुर्जनः प्रियवादीति नैतद् विश्वासकारणम्।
मधु तिष्ठति जिह्वाग्रे हृदये तु हलाहलम्॥

आशय…दुर्जन व्यक्ति यदि प्रिय (मधुर लगने वाली) वाणी भी बोले तो भी उसका विश्वास नहीं करना चाहिए क्योंकि उसे जबान पर (प्रिय वाणी रूपी) मधु होने पर भी हृदय में हलाहल (विष) ही भरा होता है।


सर्पदुर्जनयोर्मध्ये वरं सर्पो न दुर्जनः।
सर्पो दशती कालेन दुर्जनस्तु पदे पदे॥

आशय…(यदि साँप और दुष्ट की तुलना करें तो) साँप दुष्ट से अच्छा है क्योंकि साँप कभी-कभार ही डँसता है पर दुष्ट पग-पग पर (प्रत्येक समय) डँसता है।


वरं एको गुणी पुत्रो न च मूर्खशतान्यपि।
एकश्चंद्रस्तमो हन्ति न च तारागणोऽपि च

आशय…सौ मूर्ख पुत्र होने की अपेक्षा एक गुणवान पुत्र होना श्रेष्ठ है, अन्धकार का नाश केवल एक चन्द्रमा ही कर देता है पर तारों के समूह नहीं कर सकते।


विदेशेषु धनं विद्या व्यसनेष धनं मतिः।
परलोके धनं धर्मः शीलं सर्वत्र वै धनम्॥

आशय…परदेस में रहने के लिए विद्या ही धन है, व्यसनी व्यक्ति के लिए चातुर्य ही धन है, परलोक की कामना करने वाले के लिए धर्म ही धन हैं किन्तु शील (सदाचार) सर्वत्र (समस्त स्थानों के लिए) ही धन है।


अल्पानामपि वस्तूनां संहति कार्यसाधिका।
तृणैर्गुत्वमापन्नैर्बध्यन्ते मत्तदन्तिनः॥

आशय…इस सुभाषित में यह सन्देश दिया गया है कि छोटी-छोटी बातों के समायोजन से बड़ा कार्य सिद्ध हो जाता है जैसे कि तृणों को जोड़कर बनाई गई डोर हाथी को बाँध देता है।


अतिपरिचयादवज्ञा संततगमनात् अनादरो भवति।
मलये भिल्ला पुरन्ध्री चन्दनतरुकाष्ठमं इन्धनं कुरुते॥

आशय…अतिपरिचय (बहुत अधिक नजदीकी) अवज्ञा और किसी के घर बार बार जाना अनादर का कारण बन जाता है जैसे कि मलय पर्वत की भिल्लनी चंदन के लकड़ी को ईंधन के रूप में जला देती है।


सर्पः क्रूरः खलः क्रूरः सर्पात् क्रूरतरः खलः।
सर्पः शाम्यति मन्त्रैश्च दुर्जनः केन शाम्यति॥

आशय…साँप भी क्रूर होता है और दुष्ट भी क्रूर होता है किन्तु दुष्ट साँप से अधिक क्रूर होता है क्योंकि साँप के विष का तो मन्त्र से शमन हो सकता है किन्तु दुष्ट के विष का शमन किसी प्रकार से नहीं हो सकता।


लालयेत् पंच वर्षाणि दश वर्षाणि ताडयेत्।
प्राप्ते षोडशे वर्षे पुत्रे मित्रवदाचरेत्॥

आशय…पाँच वर्ष की अवस्था तक पुत्र का लाड़ करना चाहिए, दस वर्ष की अवस्था तक (उसी की भलाई के लिए) उसे ताड़ना देना चाहिए और उसके सोलह वर्ष की अवस्था प्राप्त कर लेने पर उससे मित्रवत व्यहार करना चाहिए।


सम्पूर्ण कुंभो न करोति शब्दं अर्धोघटो घोषमुपैति नूनम्।
विद्वान कुलीनो न करोति गर्वं गुणैर्विहीना बहु जल्पयंति॥

आशय…जिस प्रकार से आधा भरा हुआ घड़ा अधिक आवाज करता है पर पूरा भरा हुआ घड़ा जरा भी आवाज नहीं करता उसी प्रकार से विद्वान अपनी विद्वता पर घमण्ड नहीं करते जबकि गुणविहीन लोग स्वयं को गुणी सिद्ध करने में लगे रहते हैं।


मूर्खा यत्र न पूज्यते धान्यं यत्र सुसंचितम्।
दम्पत्यो कलहो नास्ति तत्र श्रीः स्वयमागता॥

आशय…जहाँ पर मूर्खो की पूजा नहीं होती (अर्थात् उनकी सलाह नहीं मानी जाती), धान्य को भलीभाँति संचित करके रखा जाता है और पति पत्नी के मध्य कलह नहीं होता वहाँ लक्ष्मी स्वयं आ जाती हैं।


मृगाः मृगैः संगमुपव्रजन्ति गावश्च गोभिस्तुरंगास्तुरंगैः।
मूर्खाश्च मूर्खैः सुधयः सुधीभिः समानशीलव्यसनेष सख्यम्॥

आशय…हिरण हिरण का अनुरण करता है, गाय गाय का अनुरण करती है, घोड़ा घोड़े का अनुरण करता है, मूर्ख का अनुरण करता है और बुद्धिमान का अनुरण करता है। मित्रता समान गुण वालों में ही होती है।


शतेषु जायते शूरः सहस्त्रेषु च पण्डितः।
वक्ता दशसहस्त्रेष दाता भवति वान वा॥

आशय…सौ लोगों में एक शूर पैदा होता है, हजार लोगों में एक पण्डित पैदा होता है, दस हजार लोगों में एक वक्ता पैदा होता है और दाता कोई बिरला ही पैदा होता है।


अन्नदानं परं दानं विद्यादानमतः परम्।
अन्नेन क्षणिका तृप्तिः यावज्जीवं च विद्यया॥

आशय…अन्न का दान परम दान है और विद्या का दान भी परम दान दान है किन्तु दान में अन्न प्राप्त करने वाली कुछ क्षणों के लिए ही तृप्ति प्राप्त होती है जबकि दान में विद्या प्राप्त करने वाला (अपनी विद्या से आजीविका कमा कर) जीवनपर्यन्त तृप्ति प्राप्त करता है।


मूर्खस्य पंच चिह्नानि गर्वो दुर्वचनं तथा।
क्रोधस्य दृढ़वादश्च परवाक्येषवनादरः॥

आशय…मूर्खों के पाँच लक्षण होते हैं – गर्व (अहंकार), दुर्वचन (कटु वाणी बोलना), क्रोध, कुतर्क और दूसरों के कथन का अनादर।


नमन्ति फलिनो वृक्षाः नमन्ति गुणिनो जनाः।
शुष्ककाष्ठश्च मूर्खश्च न नमन्ति कदाचन॥

आशय…जिस प्रकार से फलों से लदी हुई वृक्ष की डाल झुक जाती है उसी प्रकार से गुणीजन सदैव विनम्र होते हैं किन्तु मूर्ख उस सूखी लकड़ी के समान होता है जो कभी नहीं झुकता।


वृश्चिकस्य विषं पृच्छे मक्षिकायाः मुखे विषम्।
तक्षकस्य विषं दन्ते सर्वांगे दुर्जनस्य तत्॥

आशय…बिच्छू का विष पीछे (उसके डंक में) होता है, मक्षिका (मक्खी) का विष उसके मुँह में होता है, तक्षक (साँप) का विष उसके दाँत में होता है किन्तु दुर्जन मनुष्य के सारे अंग विषैले होते हैं।


विकृतिं नैव गच्छन्ति संगदोषेण साधवः।
आवेष्टितं महासर्पैश्चनदनं न विषायते॥

आशय…जिस प्रकार से चन्द के वृक्ष से विषधर के लिपटे रहने पर भी वह विषैला नहीं होता उसी प्रकार से संगदोष (कुसंगति) होने पर भी साधुजनों के गुणों में विकृति नहीं आती।


घटं भिन्द्यात् पटं छिनद्यात् कुर्याद्रासभरोहण।
येन केन प्रकारेण प्रसिद्धः पुरुषो भवेत्॥

आशय…घड़े तोड़कर, कपड़े फाड़कर या गधे पर सवार होकर, चाहे जो भी करना पड़े, येन-केन-प्रकारेण प्रसिद्धि प्राप्त करना चाहिए। (ऐसा कुछ लोगों का सिद्धान्त होता है।)


तृणानि नोन्मूलयति प्रभन्जनो मृदूनि नीचैः प्रणतानि सर्वतः।
स्वभाव एवोन्नतचेतसामयं महान्महत्स्वेव करोति विक्रम॥

आशय…जिस प्रकार से प्रचण्ड आंधी बड़े बड़े वृक्षों को जड़ से उखाड़ देता है किन्तु छोटे से तृण को नहीं उखाड़ता उसी प्रकार से पराक्रमीजन अपने बराबरी के लोगों पर ही पराक्रम प्रदर्शित करते हैं और निर्बलों पर दया करते हैं।


प्रदोषे दीपकश्चन्द्रः प्रभाते दीपको रविः।
त्रैलोक्ये दीपको धर्मः सुपुत्र कुलदीपकः॥

आशय…शाम का दीपक चन्द्रमा होता है, सुबह का दीपक सूर्य होता है, तीनों लोकों का दीपक धर्म होता है और कुल का दीपक सुपुत्र होता है।


अनारम्भो हि कार्याणां प्रथमं बुद्धिलक्षणम्।
प्रारब्धस्यान्तगमनं द्वितीयं बुद्धिलक्षणम्॥

आशय…(आलसी लोगों की) बुद्धि के दो लक्षण होते हैं – प्रथम कार्य को आरम्भ ही नहीं करना और द्वितीय भाग्य के भरोसे बैठे रहना।


परोपदेशवेलायां शिष्टाः सर्वे भवन्ति वै।
विसमरन्तीह शिष्टत्वं स्वकार्ये समुस्थिते॥

आशय…दूसरों के कष्ट में पड़ने पर हम उन्हें जो उपदेश देते हैं, स्वयं कष्ट में पड़ने पर उन्हीं उपदेशों को भूल जाते हैं।


गुणवन्तः क्लिश्यन्ते प्रायेण भवन्ति निर्गुणाः सुखिनः।
बन्धनमायान्ति शुकाः यथेष्टसंचारिणः काकाः॥

आशय…गुणवान को क्लेश भोगना पड़ता है और निर्गुण सुखी रहता है जैसे कि तोता अपनी सुन्दरता के गुण के कारण पिंजरे में डाल दिया जाता है किन्तु कौवा आकाश में स्वच्छन्द विचरण करता है।


नास्ति विद्यासमं चक्षुः नास्ति सत्यसमं तपः।
नास्ति रागसमं दुःखं नास्ति त्यागसमं सुखम्॥

आशय…विद्या के समान कोई चक्षु (आँख) नहीं है, सत्य के समान कोई तप नहीं है, राग (वासना, कामना) के समान कोई दुःख नहीं है और त्याग के समान कोई सुख नहीं है।


त्यजन्ति मित्राणि धनैर्विहीनं पुत्राश्च दाराश्च सुहृज्जनाश्च।
तमर्शवन्तं पुराश्रयन्ति अर्थो हि लोके मनुषस्य बन्धुः॥

आशय…मनुष्य के धनहीन हो जाने पर पत्नी, पुत्र, मित्र, निकट सम्बन्धी आदि सभी उसका त्याग कर देते हैं और उसके धनवान बन जाने पर वे सभी पुनः उसके आश्रय में आ जाते हैं। इस लोक में धन ही मनुष्य का बन्धु है।


कुसुमं वर्णसंपन्नं गन्धहीनं न शोभते।
न शोभते क्रियाहीनं मधुरं वचनं तथा॥

आशय…जिस प्रकार से गन्धहीन होने पर सुन्दर रंगों से सम्पन्न पुष्प शोभा नहीं देता, उसी प्रकार से अकर्मण्य होने पर मधुरभाषी व्यक्ति भी शोभा नहीं देता।


उत्साहो बलवानार्य नास्त्युत्साहात्परं बलम्।
सोत्साहस्य च लोकेषु न किंचिदपि दुर्लभम्॥

आशय…जिस व्यक्ति के भीतर उत्साह होता है वह बहुत बलवान होता है। उत्साह से बढ़कर कोई अन्य बल नहीं है, उत्साह ही परम् बल है। उत्साही व्यक्ति के लिए इस संसार में कुछ भी वस्तु दुर्लभ नहीं है।


यस्य नास्ति स्वयं प्रज्ञा शास्त्रं तस्य करोति किम्।
लोचनाभ्यांविहीनस्य दर्पणः किं करिष्यति॥

आशय…जिस प्रकार से अन्धे व्यक्ति के लिए दर्पण कुछ नहीं कर सकता उसी प्रकार से विवेकहीन व्यक्ति के लिए शास्त्र भी कुछ नहीं कर सकते।


विषादप्यमृतं ग्राह्यं बालादपि सुभाषितम्।
अमित्रादपि सद्वृत्तं अमेध्यादपि कांचनम्॥

आशय…विष से भी मिले तो अमृत को स्वीकार करना चाहिए, छोटे बच्चे से भी मिले तो सुभाषित (अच्छी सीख) को स्वीकार करना चाहिए, शत्रु से भी मिले तो अच्छे गुण को स्वीकार करना चाहिए और गंदगी से भी मिले तो सोने को स्वीकार करना चाहिए।


मुण्डे मुण्डे मतिर्भिन्ना कुण्डे कुण्डे नवं पयः।
जातौ जातौ नवाचारा नवा वाणी मुखे मुखे॥

आशय…भिन्न-भिन्न मस्तिष्क में भिन्न-भिन्न मति (विचार) होती है, भिन्न-भिन्न सरोवर में भिन्न-भिन्न प्रकार का पानी होता है, भिन्न-भिन्न जाति के लोगों के भिन्न-भिन्न जीवनशैलियाँ (परम्परा, रीति-रिवाज) होती हैं और भिन्न-भिन्न मुखों से भिन्न-भिन्न वाणी निकलती है।


नरस्याभरणं रूपं रूपस्याभारणं गुनः।
गुणस्याभरणं ज्ञानं ज्ञानस्याभरणं क्षमा॥

आशय…मनुष्य का अलंकार (गहना) रूप होता है, रूप का अलंकार (गहना) गुण होता है, गुण का अलंकार (गहना) ज्ञान होता है और ज्ञान का अलंकार (गहना) क्षमा होता है।


अपूर्व कोपि कोशोयं विद्यते तव भारति।
व्ययतो वृद्धमायाति क्षयमायाति संचयात्॥

आशय…हे माता सरस्वती! आपका कोश (विद्या) बहुत ही अपूर्व है जिसे खर्च करने पर बढ़ते जाता है और संचय करने पर घटने लगता है।


व्यसने मित्रपरीक्षा शूरपरीक्षा रणाङ्गणे भवति।
विनये भृत्यपरीक्षा दानपरीक्षाच दुर्भिक्षे॥

आशय…खराब समय आने पर मित्र की परीक्षा होती है, युद्धस्थल में शूरवीर की परीक्षा होती है, नौकर की परीक्षा विनय से होती है और दान की परीक्षा अकाल पड़ने पर होती है।


राजा राष्ट्रकृतं पापं राज्ञः पापं पुरोहितः।
भर्ता च स्त्रीकृतं पापं शिष्य पापं गुरस्था॥

आशय…राष्ट्र के अहित का जिम्मेदार राजा का पाप होता है, राजा के पाप का जिम्मेदार उसका पुरोहित (मन्त्रीगण) होता है, स्त्री के गलत कार्य का जिम्मेदार उसका पति होता है और शिष्य के पाप का जिम्मेदार गुरु होता है।


पुस्तकस्था तु या विद्या परहस्तगतं धनम्।
कार्यकाले समुत्पन्ने न सा विद्या न तद् धनम्॥

आशय…ज्ञान यदि पुस्तक में ही रहे (अर्थात् उसे पढ़ा न जाए) और स्वयं का धन यदि किसी अन्य के हाथों में हो तो आवश्यकता पड़ने पर उस ज्ञान और धन का उपयोग नहीं नहीं किया जा सकता।


अधमाः धनमिच्छन्ति धनं मानं च मध्यमाः।
उत्तमाः मामिच्छन्ति मानो हि महतां धनम्॥

आशय…निम्न वर्ग का व्यक्ति केवल धन की इच्छा रखता है, मध्यम वर्ग का व्यक्ति धन और मान दोनों की ही इच्छा रखता है और उत्तम वर्ग का व्यक्ति केवल मान-सम्मान की इच्छा रखता है। मान-सम्मान का धन से अधिक महत्व होता है।


अतितृष्णा न कर्तव्या तृष्णां नैव परित्यजेत्।
शनैः शनैश्च भोक्व्यं स्वयं वित्तमुपार्जितम्॥

आशय…बहुत अधिक इच्छाएँ करना सही नहीं है और इच्छाओं का त्याग कर देना भी सही नहीं है। अपने उपार्जित (कमाए हुए) धन के अनुरूप ही इच्छा करना चाहिए वह भी एक बार में नहीं बल्कि धीरे धीरे।


वृथा वृष्टिः समुद्रेषु वृथा तृप्तेषु भोजनम्।
वृथा दानं धनाढ्येषु वृथा दीपो दिवाऽपि च॥

आशय…समुद्र में हुई वर्षा का कोई मतलब नहीं होता, भरपेट खाकर तृप्त हुए व्यक्ति को भोजन कराने का कोई मतलब नहीं होता, धनाढ्य व्यक्ति को दान देने का कोई मतलब नहीं होता और सूर्य के प्रकाश में दिया जलाने का कोई मतलब नहीं होता।


पबन्ति नद्यः स्वयं एव न अम्भः स्वयं न खादन्ति फलानि वृक्षाः।
न अदन्ति सस्य खलु वारिवाहा परोपकाराय सतां विभतयः॥

आशय…नदी स्वयं के जल को नहीं पीती, वृक्ष स्वयं के फल को नहीं खाते और बादल अपने द्वारा पानी बरसा कर पैदा किए गए अन्न को नहीं खाते। सज्जन हमेशा परोपकार ही करते हैं।


महाजनस्य संसर्गः कस्य नोन्नतिकारकः।
पद्मपत्रस्थितं तोयं धत्ते मुक्ताफलश्रियम्॥

आशय…महान व्यक्तियों की संगति किसे उन्नति प्रदान नहीं करती? (अर्थात् महान व्यक्तियों की संगति से उन्नति ही होती है।) कमल के फूल पर पानी की बूंद मोती के समान दिखने लगता है (अर्थात् कमल की संगत से पानी मोती बन जाता है।)


स्वभावो नोपदेशेन शक्यते कर्तुमन्यथा।
सुतप्तमपि पानीयं पुनर्गच्छति शीतताम्॥

आशय…उपदेश देकर किसी के स्वभाव को बदला नहीं जा सकता, पानी को कितना भी गरम करो, कुछ समय बाद वह फिर से ठंडा हो ही जाता है।


दानेन तुल्यो विधिरास्ति नान्यो लोभोच नान्योस्ति रिपुः पृथिव्यां।
विभूषणं शीलसमं च नान्यत् सन्तोषतुल्यं धमस्ति नान्य्॥

आशय…दान के समान अन्य कोई अच्छा कर्म नहीं है, लोभ के समान इस पृथ्वी पर कोई अन्य शत्रु नहीं है, शील के समान कोई गहना नहीं है और सन्तोष के समान कोई धन नहीं है।


परोऽपि हितवान् बन्धुः बन्धुरप्यहितः परः।
अहितो देहजो व्याधिः हितमारण्यमौषधम्॥
(हितोपदेश)

आशय…व्याधियाँ (बीमारियाँ) हमारे शरीर के भीतर रहते हुए भी हमारा बुरा करती हैं और औषधियाँ (जड़ी-बूटियाँ) हमसे दूर पेड़-पौधों में में रहकर भी हमारा भला करती हैं (अर्थात् व्याधियाँ हमारे दुश्मन हैं और औषधियाँ मित्र)। इसी प्रकार से जिनसे हमारा रक्त का सम्बन्ध अर्थात् किसी प्रकार की रिश्तेदार न हो किन्तु वह हमारा हित करे तो वे अपने होते हैं और यदि रिश्तेदार होकर भी कोई हमारा अहित करे तो वह पराया होता है।


अहो दुर्जनसंसर्गात् मानहानिः पदे पदे।
पावको लौहसंगेन मुद्गरैरभिताड्यते॥

आशय…दुष्ट के संग रहने पर कदम कदम पर अपमान होता है। पावक (अग्नि) जब लोहे के साथ होता है तो उसे घन से पीटा जाता है।


चिता चिन्तासम ह्युक्ता बिन्दुमात्र विशेषतः।
सजीवं दहते चिन्ता निर्जीवं दहते चिता॥

आशय…चिता और चिंता में मात्र एक बिन्दु (अनुस्वार) का ही फर्क है किन्तु दोनों ही एक समान है, जो जीते जी जलाता है वह चिंता है और जो मरने के बाद (निर्जीव) को जलाता है वह चिता है।


अङ्गणवेदी वसुधा कुल्या जलधिः स्थली च पातालम्।
वल्मीकश्च सुमेरुः कृतप्रतिज्ञस्य धीरस्य॥

आशय…अपनी प्रतिज्ञा पर दृढ़ रहने वाले धीर व्यक्ति के लिए यह वसुधा (पृथ्वी) एक बगिया के समान होता है (जब चाहे घूम कर जी बहला लो), समुद्र एक नहर के समान होता है (जब चाहे तैर कर पार कर लो), पाताल लोक एक मनोरंजन स्थल (पिकनिक स्पॉट) के समान होता है (जब जाहे जाकर पिकनिक मना लो) और सुमेरु पर्वत एक चींटी के घर के समान होता है (जब चाहे चोटी पर चढ़ जाओ)। (अतः मनुष्य को दृढ़प्रतिज्ञ एवं धीर-गम्भीर होना चाहिए।)


येषां न विद्या न तपो न दानं ज्ञानं न शीलं न गुणो न धर्मः।
ते मर्त्यलोके भूविभारभूता मनुष्यरूपेण मृगाश्चरन्ति॥

आशय…विद्या, तप (कठिन परिश्रम कर पाने की योग्यता), दानशीलता, शील, गुण तथा धर्म से विहीन व्यक्ति मृत्युलोक (पृथ्वी) पर भार के समान है, वह मनुष्य के रूप में पशु ही है।


माता मित्रं पिता चेति स्वभावात् त्रितयं हितम्।
कार्यकारणतश्चान्ये भवन्ति हितबुद्धयः॥

आशय…माता, पिता और मित्र तीनों ही स्वभावतः ही हमारे हित के लिए सोचते हैं, वे हमारे हित करने के बदले में किसी प्रकार की अपेक्षा नहीं रखते। इन तीनों के सिवाय अन्य लोग यदि हमारे हित की सोचते हैं तो वे उसके बदले में हमसे कुछ न कुछ अपेक्षा भी रखते हैं।


वदनं प्रसादसदनं सदयं हृदयं सुधामुचो वाचः।
करणं परोपकरणं येषां केषां न ते वन्द्याः॥

आशय…सदैव प्रसन्न-वदन (हँसमुख), हृदय में दया की भावना रखने वाले, अमृत के समान मीठे वचन बोलने वाले तथा परोपकार में लिप्त रहने वाले व्यक्ति भला किसके लिए वन्दनीय नहीं होगा?

गर्वाय परपीड़ाय दुर्जस्य धनं बलम्।
सज्जनस्य दानाय रक्षणाय च ते सदा॥

आशय…दुर्जन (दुष्ट) का धन और बल गर्व (घमण्ड) तथा दूसरों को पीड़ा पहुँचाना होता है और दान एवं (निर्बलों की) रक्षा करना सज्जन का।

यथा चित्तं तथा वाचो यथा वाचस्तथा क्रियाः।
चित्ते वाचि क्रियायां च साधुनामेकरूपता॥

आशय…जो चित्त (मन) में हो वही वाणी से प्रकट होना चाहिए और जो वाणी से प्रकट हो उसके अनुरूप ही कार्य करना चाहिए। जिनके चित्त, वाणी और कर्म में एकरूपता होती है वही साधुजन होते हैं।

छायामन्यस्य कुर्वन्ति स्वयं तिष्टन्ति चातपे।
फलान्यपि परार्थाय वृक्षाः सत्पुरुष इव॥

आशय…वृक्ष स्वयं सूर्य के प्रखर ताप को सहन करके दूसरों को छाया प्रदान करते हैं तथा उनके फल भी दूसरों के उपयोग के लिए होते हैं, वृक्ष के समान सत्पुरुष भला कौन है?


दुर्जन:स्वस्वभावेन परकार्ये विनश्यति। 
नोदर तृप्तिमायाती मूषक:वस्त्रभक्षक:।।

आशय…दुष्ट व्यक्ति का स्वभाव ही दूसरे के कार्य बिगाड़ने का होता है। वस्त्रों को काटने वाला चूहा पेट भरने के लिए कपड़े नहीं काटता। 


यस्य नास्ति स्वयं प्रज्ञा, शास्त्रं तस्य करोति किं। 
लोचनाभ्याम विहीनस्य, दर्पण:किं करिष्यति।।

आशय…जिस मनुष्य के पास स्वयं का विवेक नहीं है, शास्त्र उसका क्या करेंगे। जैसे नेत्रविहीन व्यक्ति के लिए दर्पण व्यर्थ है।


दुर्जन:परिहर्तव्यो विद्यालंकृतो सन । 
मणिना भूषितो सर्प:किमसौ न भयंकर:।।

आशय… दुष्ट व्यक्ति यदि विद्या से सुशोभित भी हो अर्थात वह विद्यावान भी हो तो भी उसका परित्याग कर देना चाहिए। जैसे मणि से सुशोभित सर्प क्या भयंकर नहीं होता? 


अनादरो विलम्बश्च वै मुख्यम निष्ठुर वचनम।
पश्चतपश्च पञ्चापि दानस्य दूषणानि च।।

आशय…अपमान करके दान देना, विलंब से देना, मुख फेर के देना, कठोर वचन बोलना और देने के बाद पश्चाताप करना- ये पांच क्रियाएं दान को दूषित करती हैं।


अश्वस्य भूषणं वेगो मत्तं स्याद गजभूषणम्।
चातुर्यं भूषणं नार्या उद्योगो नरभूषणम्॥

तेज चाल घोड़े का आभूषण है, मत्त चाल हाथी का आभूषण है, चातुर्य नारी का आभूषण है और उद्योग में लगे रहना नर का आभूषण है।


क्षणशः कणशश्चैव विद्यां अर्थं च साधयेत्।
क्षणे नष्टे कुतो विद्या कणे नष्टे कुतो धनम्॥

क्षण-क्षण का उपयोग सीखने के लिए और प्रत्येक छोटे से छोटे सिक्के का उपयोग उसे बचाकर रखने के लिए करना चाहिए। क्षण को नष्ट करके विद्याप्राप्ति नहीं की जा सकती और सिक्कों को नष्ट करके धन नहीं प्राप्त किया जा सकता।


1. वसुधैव कुटुम्बकम्

अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम्।
उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्॥

अर्थ: “यह मेरा अपना है और यह पराया है” ऐसी सोच छोटे दिल वाले लोग रखते हैं। उदार चरित्र (बड़े मन) वाले लोगों के लिए तो पूरी पृथ्वी ही उनका परिवार होती है।


2. उद्यम (परिश्रम) ही सच्चा मित्र

आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः।
नास्त्युद्यमसमो बन्धुः कृत्वा यं नावसीदति॥

अर्थ: मनुष्य के शरीर में रहने वाला आलस्य ही उसका सबसे बड़ा दुश्मन है। परिश्रम के समान दूसरा कोई मित्र नहीं है, क्योंकि मेहनत करके मनुष्य कभी दुखी नहीं होता।


3. विद्या का महत्व

विदेशेषु धनं विद्या व्यसनेषु धनं मतिः।
परलोके धनं धर्मः शीलमेत्र सर्वत्र वै धनम्॥

अर्थ: विदेश में विद्या ही धन होती है, संकट के समय बुद्धि ही धन होती है, परलोक में धर्म धन होता है और अच्छा चरित्र (शील) हर जगह सच्चा धन होता है।


4. सत्य और प्रिय भाषण

सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयात् न ब्रूयात् सत्यमप्रियम्।
प्रियं च नानृतं ब्रूयात् एष धर्मः सनातनः॥

अर्थ: सत्य बोलो, प्रिय बोलो, लेकिन कभी ऐसा सत्य मत बोलो जो दूसरों को अप्रिय (बुरा) लगे। ऐसा प्रिय झूठ भी मत बोलो जो असत्य हो। यही सनातन धर्म है।


5. विद्या और धन का संचय

क्षणशः कणशश्चैव विद्यामर्थं च साधयेत्।
क्षणे नष्टे कुतो विद्या कणे नष्टे कुतो धनम्॥

अर्थ: एक-एक क्षण बचाकर विद्या प्राप्त करनी चाहिए और एक-एक कण (पैसा) जोड़कर धन बढ़ाना चाहिए। पल बीत जाने पर विद्या और कण नष्ट होने पर धन कहाँ मिलता है?


6. सज्जनों की समानता

यथा चित्तं तथा वाचो यथा वाचस्तथा क्रियाः।
चित्ते वाचि क्रियायांच साधुनामेकरूपता॥

अर्थ: जैसा मन में होता है वैसी ही वाणी होती है, और जैसी वाणी होती है वैसे ही कर्म होते हैं। महापुरुषों के मन, वचन और कर्म में हमेशा एकरूपता (समानता) होती है।


7. पृथ्वी के तीन रत्न

पृथिव्यां त्रीणि रत्नानि जलमन्नं सुभाषितम्।
मूढैः पाषाणखंडेषु रत्नसंज्ञा विधीयते॥

अर्थ: पृथ्वी पर तीन ही वास्तविक रत्न हैं—जल, अन्न और सुभाषित (मीठी/अच्छी बातें)। मूर्ख लोग पत्थरों के टुकड़ों (हीरा-जवाहरात) को रत्न का नाम देते हैं।


8. विद्या विहीन मनुष्य पशु समान

येषां न विद्या न तपोन दानं ज्ञानं न शीलं न गुणो न धर्मः।
ते मर्त्यलोके भुवि भारभूता मनुष्यरूपेण मृगाश्चरन्ति॥

अर्थ: जिस मनुष्य के पास न विद्या है, न तप है, न दान है, न ज्ञान है, न शील है, न गुण है और न धर्म है; वे इस पृथ्वी पर भार के समान हैं और मनुष्य रूप में पशुओं की तरह घूमते हैं।


9. माता और मातृभूमि

अपि स्वर्णमयी लंका न मे लक्ष्मण रोचते।
जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी॥

अर्थ: श्री राम लक्ष्मण से कहते हैं—हे लक्ष्मण! यह सोने की लंका भी मुझे अच्छी नहीं लगती। जननी (माता) और जन्मभूमि (मातृभूमि) स्वर्ग से भी बढ़कर होती हैं।


10. स्वभाव नहीं बदलता

स्वभावो नोपदेशेन शक्यते कर्तुमन्यथा।
सुतप्तमपि पानीयं पुनर्गच्छति शीतताम्॥

अर्थ: किसी व्यक्ति का मूल स्वभाव उपदेश या सलाह से नहीं बदला जा सकता। ठीक वैसे ही, जैसे अच्छी तरह उबाला हुआ पानी भी कुछ देर बाद फिर से ठंडा हो जाता है।


11. मूर्ख की पहचान

अनाहूतः प्रविशति अपृष्टो बहु भाषते।
अविश्वस्ते विश्वसिति मूढचेता नराधमः॥

अर्थ: जो व्यक्ति बिना बुलाए किसी के यहाँ प्रवेश करता है, बिना पूछे बहुत बोलता है और जिस पर विश्वास नहीं किया जाना चाहिए उस पर भी भरोसा करता है, वह मूर्ख और नराधम (नीच) होता है।


12. अभ्यास से मूर्ख भी ज्ञानी बनता

वरं प्रज्ञो न मूर्खस्तु एकश्चन्द्रो तमो हन्ति न च तारागणैరपि।

अर्थ: एक बुद्धिमान व्यक्ति सैकड़ों मूर्खों से बेहतर है। आकाश में अकेला चंद्रमा अंधकार को मिटा देता है, हज़ारों तारे मिलकर भी उसे नहीं मिटा पाते।


13. परोपकार ही असली महानता

परोपकाराय फलन्ति वृक्षाः परोपकाराय बहन्ति नद्यः।
परोपकाराय दुहन्ति गावो परोपकारार्थमिदं शरीरम्॥

अर्थ: वृक्ष दूसरों के लिए फल देते हैं, नदियाँ दूसरों के लिए पानी बहाती हैं, गायें दूसरों के लिए दूध देती हैं—इसी प्रकार हमारा यह शरीर भी परोपकार के लिए ही है।


14. पुस्तकों का ज्ञान और आचरण

पुस्तकेषु हि या विद्या परगृहगतं च धनम्।
कार्यकाले समुत्पन्ने न सा विद्या न तद्धनम्॥

अर्थ: जो विद्या केवल पुस्तकों में बंद है और जो धन दूसरे के पास (पराए हाथ) चला गया है, जरूरत पड़ने पर न तो वह विद्या काम आती है और न ही वह धन काम आता है।


15. मधुर वाणी का प्रभाव

प्रियवाक्यप्रदानैन सर्वे तुष्यन्ति जन्तवः।
तस्माद् तदेव वक्तव्यं वचने का दरिद्रता॥

अर्थ: मीठे और प्रिय वचन बोलने से संसार के सभी जीव संतुष्ट होते हैं। इसलिए हमेशा प्रिय ही बोलना चाहिए, मीठे वचन बोलने में कंजूसी कैसी?


16. संतोष सबसे बड़ा धन

तुष्टः कश्चन न तुष्टः कामस्य नैताः वचनानि सन्ति।
संतोषामृततृप्तस्य यत्सुखं शान्तये कुतः॥

अर्थ: संतोष रूपी अमृत से तृप्त व्यक्ति को जो आंतरिक सुख और शांति मिलती है, वैसी शांति तृष्णा (इच्छाओं) में डूबे हुए इंसान को कभी नहीं मिलती।


17. समय किसी की प्रतीक्षा नहीं करता

श्वः कार्यमद्य कुर्वीत पूर्वाष्णे चापरवाहिकम्।
न हि प्रतीक्षते मृत्युः कृतं अस्य न वा कृतम्॥

अर्थ: कल का काम आज ही कर लेना चाहिए और दोपहर से पहले दोपहर के बाद वाला काम। मृत्यु किसी का इंतज़ार नहीं करती कि उसका काम पूरा हुआ है या नहीं।


18. सिंह का स्वभाव

प्रियमिवाभिप्रायं कुर्यात् न तु कोपं प्रकटीकुर्यात्।
नास्य कार्यस्य हानिः स्यात् एष बुद्धिमतां नयः॥

अर्थ: बुद्धिमान व्यक्ति वही काम करता है जिससे काम की हानि न हो, वह समय देखकर अपनी नीति अपनाता है।


19. कुलदीपक सुपुत्र

श्लोक: प्रदोषे दीपकश्चंद्रः प्रभाते दीपको रविः।
त्रैलोक्य दीपकः धर्मः सुपुत्रः कुलदीपिकाः॥
अर्थ: रात्रि का दीपक चंद्रमा है, सुबह का दीपक सूर्य है, तीनों लोकों का दीपक धर्म है और योग्य सुपुत्र पूरे कुल को रोशन करने वाला दीपक होता है। [1]

20. संकट में धैर्य

श्लोक: आपत्सु धैर्यं अभ्युदये क्षमा च सद्वार्षि वाक्पटुता युधि विक्रमः।
यशसि चाभिरुचिः प्रकृतिसिद्धं इदं हि महात्मनाम्॥
अर्थ: संकट के समय धैर्य रखना, उन्नति के समय क्षमाशीलता दिखाना, सभा में वाक्पटुता (अच्छा बोलना), युद्ध में पराक्रम दिखाना और यश की इच्छा रखना—यह सब महात्माओं का स्वाभाविक गुण होता है।

🌟 १. विद्या और ज्ञान (Knowledge & Education)

  1. विद्या ददाति विनयं विनयाद् याति पात्रताम्।
    पात्रत्वात् धनमाप्नोति धनाद् धर्मं ततः सुखम्॥
    अर्थ: विद्या विनय देती है, विनय से योग्यता आती है, योग्यता से धन प्राप्त होता है, धन से धर्म होता है और धर्म से सुख मिलता है।
  2. न चोरहार्यं न च राजहार्यं न भ्रातृभाज्यं न च भारकारि।
    व्यये कृते वर्धत एव नित्यं विद्याधनं सर्वधनप्रधानम्॥
    अर्थ: विद्या रूपी धन को न चोर चुरा सकता है, न राजा छीन सकता है, न भाइयों में बांटा जा सकता है और न ही यह भारी होता है। खर्च करने पर यह हमेशा बढ़ता है। इसलिए विद्याधन सभी धनों में प्रधान है।
  3. स्वगृहे पूज्यते मूर्खः स्वग्रामे पूज्यते प्रभुः।
    स्वदेशे पूज्यते राजा विद्वान् सर्वत्र पूज्यते॥
    अर्थ: मूर्ख की पूजा उसके घर में होती है, मुखिया की पूजा उसके गाँव में होती है, राजा की पूजा उसके देश में होती है, लेकिन विद्वान की पूजा सब जगह होती है।
  4. रूपयौवनसम्पन्ना विशालकुलसम्भवाः।
    विद्याहीना न शोभन्ते निर्गन्धा इव किंशुकाः॥
    अर्थ: रूप-जवानी से युक्त और ऊंचे कुल में पैदा होने पर भी विद्या से हीन मनुष्य वैसे ही शोभा नहीं पाता, जैसे बिना खुशबू के पलाश का फूल।
  5. आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः।
    नास्त्युद्यमसमो बन्धुः कृत्वा यं नावसीदति॥
    अर्थ: मनुष्या के शरीर में रहने वाला आलस्य ही उसका सबसे बड़ा शत्रु है। परिश्रम जैसा कोई मित्र नहीं है, जिसे करके कोई दुखी नहीं होता।

(नोट: संक्षेप और स्पष्टता के लिए आगे के मुख्य सुभाषितों की सूची दी जा रही है)

  1. पुस्तकरूपा तु या विद्या परहस्तगतं च धनम्।
    कार्यकाले समुत्पन्ने न सा विद्या न तद्धनम्॥
    अर्थ: पुस्तक में रखी विद्या और दूसरे के हाथ में गया धन, जरूरत पड़ने पर काम नहीं आते।
  2. काकचेष्टा बकोध्यानं श्वाननिद्रा तथैव च।
    अल्पहारी गृहत्यागी विद्यार्थी पञ्चलक्षणम्॥
    अर्थ: कौवे जैसी चेष्टा, बगुले जैसा ध्यान, कुत्ते जैसी नींद, कम खाने वाला और गृह-त्यागी—ये विद्यार्थी के पांच लक्षण हैं।
  3. सुखार्थिनः कुतोविद्या कुतो विद्यार्थिनः सुखम्।
    सुखार्थी वा त्यजेद्विद्यां विद्यार्थी वा त्यजेत्सुखम्॥
    अर्थ: सुख चाहने वाले को विद्या कहाँ और विद्या चाहने वाले को सुख कहाँ! सुख की इच्छा रखने वाले को विद्या त्याग देनी चाहिए और विद्यार्थी को सुख।
  4. एषाम् न विद्या न तपो न दानम्, ज्ञानं न शीलं न गुणो न धर्मः।
    ते मृत्युलोके भुवि भारभूता, मनुष्यरूपेण मृगाश्चरन्ति॥
    अर्थ: जिनके पास न विद्या है, न तप, न दान, न ज्ञान, न चरित्र, न गुण और न धर्म; वे लोग इस धरती पर भार हैं और मनुष्य के रूप में पशु की तरह घूमते हैं।
  5. ज्ञातिभिर्बंट्यते नैव चोरेणापि न नीयते।
    दाने न क्षयमायाति विद्यारत्नं महाधनम्॥
    अर्थ: विद्या रूपी रत्न को न भाई बांट सकते हैं, न चोर चुरा सकते हैं और दान करने से यह घटता नहीं है।

🤝 २. संगति और मित्रता (Company & Friendship)

  1. संसर्गजा दोषगुणा भवन्ति।
    अर्थ: संगति से ही दोष और गुण पैदा होते हैं।
  2. परोपकाराय फलन्ति वृक्षाः परोपकाराय वहन्ति नद्यः।
    परोपकाराय दुहन्ति गावः परोपकारार्थमिदं शरीरम्॥
    अर्थ: वृक्ष परोपकार के लिए फल देते हैं, नदियाँ परोपकार के लिए बहती हैं, गायें परोपकार के लिए दूध देती हैं और यह शरीर भी परोपकार के लिए ही है।
  3. उत्सवे व्यसने चैव दुर्भिक्षे राष्ट्रविप्लवे।
    राजद्वारे श्मशाने च यस्तिष्ठति स बान्धवः॥
    अर्थ: जो खुशी में, संकट में, अकाल में, देश पर आए संकट में, राजा के द्वार पर और श्मशान में साथ खड़ा रहता है, वही सच्चा मित्र है।
  4. जड्यं धियो हरति सिञ्चति वाचि सत्यं, मानोन्नतिं दिशति पापमपाकरोति।
    चेतः प्रसादयति दिक्षु तनोति कीर्तिं, सत्सङ्गतिः कथय किं न करोति पुंसाम्॥
    अर्थ: अच्छी संगति बुद्धि की जड़ता को हरती है, वाणी में सत्य सींचती है, मान-प्रतिष्ठा बढ़ाती है, पाप दूर करती है, मन को प्रसन्न करती है और दिशाओं में कीर्ति फैलाती है। बताओ, सत्संगति मनुष्यों का क्या भला नहीं करती?
  5. हंसो न शोभते मध्ये बकानां कङ्कषष्टिनाम्।
    अर्थ: बगुलाओं के बीच में हंस शोभा नहीं पाता।
  6. दुर्जनः परिहर्तव्यो विद्ययालङ्कृतोऽपि सन्।
    मणिना भूषितः सर्पः किमसौ न भयङ्करः॥
    अर्थ: दुष्ट व्यक्ति यदि विद्या से सुशोभित (पढ़ा-लिखा) भी हो, तो भी उसका त्याग कर देना चाहिए। क्या मणि से सुशोभित सांप भयानक नहीं होता?
  7. खलानां कण्टकानां च द्विविधैव प्रतिक्रिया।
    उपानन्मुखभङ्गो वा दूरतो वा विसर्जनम्॥
    अर्थ: दुष्टों और कांटों से बचने के दो ही उपाय हैं—या तो उन्हें जूते से कुचल दो या उनसे दूर रहो।
  8. छिद्रेष्वनर्था बहुलीभवन्ति।
    अर्थ: कमजोरियों या कमियों में ही मुसीबतें ज्यादा आती हैं।
  9. वरमेको गुणी पुत्रो न च मूर्खशतैरपि।
    एकश्चन्द्रस्तमो हन्ति न च तारागणोऽपि च॥
    अर्थ: सौ मूर्ख पुत्रों से एक गुणी पुत्र अच्छा है। एक अकेला चंद्रमा अंधकार को दूर कर देता है, जबकि हजारों तारे मिलकर भी ऐसा नहीं कर पाते।
  10. मित्रं प्रीतिरसायनं नयनयोरानन्दनं चेतसः।
    अर्थ: मित्र प्रेम का रसायन है, आँखों को आनंद देने वाला और मन को शांति देने वाला होता है।

💪 ३. उद्यम और कर्म (Hard Work & Karma)

  1. उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः।
    न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः॥
    अर्थ: कार्य मेहनत से सिद्ध होते हैं, केवल इच्छा करने से नहीं। सोए हुए शेर के मुंह में हिरण खुद प्रवेश नहीं करता।
  2. काव्यशास्त्रविनोदेन कालो गच्छति धीमताम्।
    व्यसनेन च मूर्खाणां निद्रया कलहेन वा॥
    अर्थ: बुद्धिमान लोगों का समय काव्य और शास्त्रों की चर्चा (अच्छे कामों) में बीतता है, जबकि मूर्खों का समय बुरी आदतों, सोने या लड़ाई-झगड़े में बीतता है।
  3. गते शोको न कर्तव्यो भविष्यं नैव चिन्तयेत्।
    वर्तमानकाल प्रवृत्तन्ते विचक्षणाः॥
    अर्थ: बीते हुए समय का शोक नहीं करना चाहिए और भविष्य की चिंता नहीं करनी चाहिए। बुद्धिमान लोग वर्तमान समय के अनुसार कार्य करते हैं।
  4. उद्योगिनं पुरुषसिंहमुपैति लक्ष्मीः, दैवेन देयमिति कापुरुषा वदन्ति।
    अर्थ: उद्योगी (मेहनती) पुरुष को ही लक्ष्मी (सफलता) प्राप्त होती है। ‘भाग्य से ही मिलेगा’ ऐसा तो कायर लोग कहते हैं।
  5. न देवो वर्तते काष्ठे न पाषाणे न मृण्मये।
    भावे हि वर्तते देवस्तस्माद् भावो हि कारणम्॥
    अर्थ: भगवान न लकड़ी में हैं, न पत्थर में, न मिट्टी की मूर्ति में। भगवान तो हमारे भावों (श्रद्धा) में वास करते हैं, इसलिए भाव ही मुख्य है।
  6. शनैः पन्थाः शनैः कन्था शनैः पर्वतमूर्धनि।
    शनैर्विद्या शनैर्वित्तं पञ्चैतानि शनैः शनैः॥
    अर्थ: मार्ग तय करना, कपड़ा सिलना, पहाड़ चढ़ना, विद्या सीखना और धन कमाना—ये पांचों काम धीरे-धीरे ही होते हैं।
  7. यथा ह्येकेन चक्रेण न रथस्य गतिर्भवेत्।
    एवं पुरुषकारेण विना दैवं न सिध्यति॥
    अर्थ: जैसे एक पहिए से रथ नहीं चल सकता, वैसे ही बिना पुरुषार्थ (कर्म) के भाग्य भी सिद्ध नहीं होता।
  8. प्रारभ्यते न खलु विघ्नभयेन नीचैः, प्रारभ्य विघ्नविहता विरमन्ति मध्याः।
    विघ्नैः पुनः पुनरपि प्रतिहन्यमानाः, प्रारब्धमुत्तमजना न परित्यजन्ति॥
    अर्थ: नीच लोग विघ्न के डर से काम शुरू ही नहीं करते। मध्यम लोग काम शुरू करके विघ्न आने पर बीच में ही छोड़ देते हैं। लेकिन उत्तम लोग बार-बार विघ्न आने पर भी शुरू किए गए कार्य को नहीं छोड़ते।
  9. कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
    अर्थ: तुम्हारा अधिकार सिर्फ कर्म करने पर है, उसके फल पर कभी नहीं।
  10. यद् यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः।
    अर्थ: श्रेष्ठ पुरुष जैसा आचरण करते हैं, सामान्य लोग भी वैसा ही व्यवहार करते हैं।

🌍 ४. नीति और सदाचार (Ethics & Righteousness)

  1. अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम्।
    उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्॥
    अर्थ: ‘यह मेरा है और यह पराया है’ ऐसी सोच छोटे दिल वाले लोगों की होती है। उदार चरित्र वाले लोगों के लिए तो पूरी धरती ही उनका परिवार है।
  2. सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयात् न ब्रूयात् सत्यमप्रियम्।
    प्रियं च नानृतं ब्रूयात् एष धर्मः सनातनः॥
    अर्थ: सत्य बोलो, प्रिय बोलो। लेकिन ऐसा सत्य मत बोलो जो अप्रिय हो (दुख पहुँचाए) और ऐसा प्रिय भी मत बोलो जो झूठ हो। यही सनातन धर्म है।
  3. परपीड़ा समं नहि किञ्चिद् अधमम्।
    अर्थ: दूसरों को कष्ट देने से बढ़कर कोई नीच काम नहीं है।
  4. लोभः मूलं पापानाम्।
    अर्थ: लालच ही सभी पापों की जड़ है।
  5. क्षमा शस्त्रं करे यस्य दुर्जनः किं करिष्यति।
    अर्थ: जिसके हाथ में क्षमा रूपी शस्त्र है, दुष्ट व्यक्ति उसका क्या बिगाड़ सकता है?
  6. सर्वं परवशं दुःखं सर्वमात्मवशं सुखम्।
    एतद्विद्यात् समासेन लक्षणं सुखदुःखयोः॥
    अर्थ: दूसरों के वश में होना दुःख है और अपने वश में होना सुख है। संक्षेप में सुख-दुःख का यही लक्षण है।
  7. धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः।
    अर्थ: मरा हुआ (नष्ट किया हुआ) धर्म मनुष्य का नाश करता है और रक्षा किया हुआ धर्म मनुष्य की रक्षा करता है।
  8. अति सर्वत्र वर्जयेत्।
    अर्थ: किसी भी चीज़ की अति (अधिकता) हमेशा वर्जित है (नुकसानदेह होती है)।
  9. वचसां हि प्रसादेन मनसो शुद्धिः जायते।
    अर्थ: वाणी की पवित्रता से ही मन की शुद्धि होती है।
  10. आचारः परमो धर्मः।
    अर्थ: सदाचार (अच्छा व्यवहार) ही सबसे बड़ा धर्म है।

🧘 ५. आत्म-नियंत्रण और सूक्तियाँ (Self-Control & Wisom)

  1. क्रोधो भवति सम्मोहात् सम्मोहात्स्मृतिविभ्रमः।
    स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति॥
    अर्थ: क्रोध से अज्ञान पैदा होता है, अज्ञान से बुद्धि भ्रमित होती है, भ्रम से स्मृति नष्ट होती है, स्मृति नष्ट होने से बुद्धि का नाश होता है और बुद्धि नष्ट होने से मनुष्य का सर्वनाश हो जाता है।
  2. मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः।
    अर्थ: मनुष्य का मन ही उसके बंधन (दुःख) और मोक्ष (सुख) का कारण है।
  3. यस्य नास्ति स्वयं प्रज्ञा शास्त्रं तस्य करोति किम्।
    लोचनाभ्यां विहीनस्य दर्पणं किं करिष्यति॥
    अर्थ: जिस मनुष्य के पास खुद की बुद्धि नहीं है, शास्त्र उसका क्या भला करेगा? जैसे आँखों से अंधे व्यक्ति के लिए आईना किसी काम का नहीं होता।
  4. शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्।
    अर्थ: शरीर ही सभी धर्मों (कर्तव्यों) को पूरा करने का पहला साधन है (इसलिए स्वास्थ्य सबसे जरूरी है)।
  5. चिन्तनीया हि विपदां आदावेव प्रतिक्रिया।
    न कूपखननम् युक्तं प्रदीप्ते वह्निना गृहे॥
    अर्थ: विपत्ति आने से पहले ही उसके उपाय सोच लेने चाहिए। घर में आग लग जाने पर कुआं खोदना सही नहीं है।
  6. लोभः प्रज्ञानमाहन्ति लोभः हन्ति च गौरवं।
    अर्थ: लालच बुद्धि को मार देता है और मान-सम्मान को नष्ट कर देता है।
  7. वाणी रसवती यस्य, यस्य श्रमवती क्रिया।
    लक्ष्मीः दानवती यस्य, सफलं तस्य जीवितम्॥
    अर्थ: जिसकी वाणी मीठी है, जिसका कार्य परिश्रम से भरा है, जिसका धन दान करने में लगता है, उसी का जीवन सफल है।
  8. दुर्लभं मानुषं जन्म।
    अर्थ: मनुष्य का जन्म बहुत दुर्लभ है।
  9. न कश्चित् कस्यचित् मित्रं न कश्चित् कस्यचित् रिपुः।
    व्यवहारेण जायन्ते मित्राणि रिपवस्तथा॥
    अर्थ: न कोई किसी का मित्र होता है और न कोई किसी का शत्रु। हमारे व्यवहार से ही लोग मित्र या शत्रु बनते हैं।
  10. संतोषः परं सुखम्।
    अर्थ: संतोष (संतुष्टि) ही सबसे बड़ा सुख है।

🌸 ६. लघु सुभाषित और अनमोल वचन (शॉर्ट सूक्तियाँ ५१ से १००)

ये छोटे और प्रभावशाली एक-पंक्ति या दो-पंक्ति के सुभाषित जीवन के गहरे सत्य बताते हैं:

  1. सत्यमेव जयते नानृतम्। (सत्य की ही जीत होती है, झूठ की नहीं।)
  2. अहिंसा परमो धर्मः। (अहिंसा ही सबसे बड़ा धर्म है।)
  3. मातृदेवो भव। (माता भगवान के समान होती हैं।)
  4. पितृदेवो भव। (पिता भगवान के समान होते हैं।)
  5. आचार्यदेवो भव। (गुरु भगवान के समान होते हैं।)
  6. अतिथिदेवो भव। (मेहमान भगवान के समान होते हैं।)
  7. विद्वान सर्वत्र पूज्यते। (विद्वान की सब जगह पूजा होती है।)
  8. शूराः पराक्रमे वसन्ति। (वीर पुरुष पराक्रम में ही जीते हैं।)
  9. लोकाः समस्ताः सुखिनो भवन्तु। (संसार के सभी जीव सुखी हों।)
  10. सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः। (सभी सुखी हों, सभी निरोगी हों।)
  11. परिवर्तनेन हि संसारे। (परिवर्तन ही संसार का नियम है।)
  12. कालः पचति भूतानि। (समय सभी को बदल या समाप्त कर देता है।)
  13. मौनं सर्वार्थ साधनम्। (मौन रहना कई बार सब कुछ सिद्ध कर देता है।)
  14. बुद्धिः यस्य बलं तस्य। (जिसके पास बुद्धि है, उसी के पास बल है।)
  15. धर्मो रक्षति रक्षितः। (यदि आप धर्म की रक्षा करेंगे, तो धर्म आपकी रक्षा करेगा।)
  16. विनाशकाले विपरीत बुद्धिः। (विनाश का समय आने पर बुद्धि उल्टी काम करने लगती है।)
  17. साहसे श्रीः प्रतिवसति। (साहस करने वाले के पास ही लक्ष्मी (सफलता) निवास करती है।)
  18. ज्ञानं परमं बलम्। (ज्ञान ही सबसे बड़ा बल है।)
  19. अज्ञः सुखमाराध्यः सुखतरमाराध्यते विशेषज्ञः। (मूर्ख को समझाना आसान है, विद्वान को और आसान, पर आधे ज्ञानी को कोई नहीं समझा सकता।)
  20. सत्यं कटुकं भवति। (सत्य हमेशा कड़वा होता है।)
  21. संसारः सुखदुःखात्मकः। (संसार सुख और दुःख का मिश्रण है।)
  22. अतिपरिचयादवज्ञा भवति। (ज्यादा जान-पहचान या नजदीकी होने से आदर कम हो जाता है।)
  23. गुणाः पूजास्थानं गुणिषु न च लिङ्गं न च वयः। (गुणवानों में गुणों की पूजा होती है, लिंग या उम्र की नहीं।)
  24. आशा नाम मनुष्याणां काचिदाश्चर्यशृङ्खला। (उम्मीद मनुष्यों के लिए एक अजीब जंजीर है, जो बंधी न होकर भी जकड़े रखती है।)
  25. शीलं परं भूषणम्। (अच्छा चरित्र ही सबसे बड़ा आभूषण है।)
  26. महाजनो येन गतः स पन्थाः। (श्रेष्ठ लोग जिस रास्ते पर चलें, वही सही रास्ता है।)
  27. लोभः संशाय कारणम्। (लालच ही विनाश या संशय का कारण है।)
  28. यथा दृष्टि तथा सृष्टि। (जैसी आपकी सोच होगी, वैसा ही आपको संसार दिखेगा।)
  29. नास्ति त्यागात् परं सुखम्। (त्याग से बढ़कर कोई सुख नहीं है।)
  30. वृथा वृष्टिः समुद्रेषु। (समुद्र में बारिश होना बेकार है, वैसे ही समर्थ को देना बेकार है।)
  31. एकं सत् विप्रा बहुधा वदन्ति। (सत्य एक ही है, विद्वान उसे अलग-अलग तरह से कहते हैं।)
  32. हितं मनोहारी च दुर्लभं वचः। (हितकारी और मन को अच्छी लगने वाली बात एक साथ मिलना दुर्लभ है।)
  33. शठं प्रति शाठ्यं कुर्यात्। (दुष्ट के साथ दुष्टता का ही व्यवहार करना चाहिए।)
  34. सहसा विदधीत न क्रियाम्। (बिना सोचे-समझे अचानक कोई कार्य नहीं करना चाहिए।)
  35. आलस्यं हि मनुष्यस्य शत्रुः। (आलस्य ही मनुष्य का सबसे बड़ा दुश्मन है।)
  36. अमन्त्रमक्षरं नास्ति नास्ति मूलमनौषधम्। (ऐसा कोई अक्षर नहीं जिससे मंत्र न बने, ऐसी कोई जड़ नहीं जो दवा न बने।)
  37. उद्योगिनं पुरुषं सिंहमुपैति लक्ष्मी। (मेहनती पुरुष सिंह के समान लक्ष्मी को खींच लेता है।)
  38. वयसि गते कः कामविकारः। (उम्र बीत जाने पर इच्छाएं अपने आप शांत हो जाती हैं।)
  39. सत्संगतिः कथय किं न करोति पुंसाम्। (अच्छी संगति मनुष्यों का क्या भला नहीं करती।)
  40. ज्ञानं भारः क्रियां विना। (अमल में न लाया जाए तो ज्ञान भी एक बोझ के समान है।)
  41. घटं भिन्द्यात् पटं छिन्द्यात्। (प्रसिद्धि पाने के लिए कुछ लोग घड़ा फोड़ते हैं या कपड़े फाड़ते हैं – यानी ओछी हरकतें करते हैं।)
  42. स्वभावो दुरतिक्रमः। (किसी भी व्यक्ति का मूल स्वभाव बदलना बहुत मुश्किल है।)
  43. दूरस्थाः पर्वताः रम्याः। (दूर के ढोल सुहावने लगते हैं / दूर से पहाड़ सुंदर दिखते हैं।)
  44. विद्वान् सर्वत्र पूज्यते। (विद्वान व्यक्ति की पूजा हर जगह होती है।)
  45. क्षमा वीरास्य भूषणम्। (क्षमा वीरों का आभूषण है।)
  46. काव्यशास्त्रविनोदेन कालो गच्छति धीमताम्। (बुद्धिमानों का समय अच्छी चर्चाओं में बीतता है।)
  47. न कश्चित् कस्यचित् रिपुः। (कोई किसी का जनम से दुश्मन नहीं होता।)
  48. सत्यं परं धीमहि। (हम परम सत्य का ध्यान करते हैं।)
  49. वसुधैव कुटुम्बकम्। (पूरी धरती ही हमारा परिवार है।)
  50. योगः कर्मसु कौशलम्। (कर्मों में कुशलता ही योग है।)

विद्या और ज्ञान (Knowledge)

  • विद्या ददाति विनयं विन्याद्याति पात्रताम्।
    पात्रत्वाद्धनमाप्नोति धनाद्धर्मं ततः सुखम्॥
    • अर्थ: विद्या विनय (नम्रता) देती है, विनय से पात्रता (योग्यता) आती है, पात्रता से धन प्राप्त होता है, धन से धर्म होता है और धर्म से सुख मिलता है।
  • न चोरहार्यं न च राजहार्यं न भ्रातृभाज्यं न च भारकारि।
    व्यये कृते वर्धत एव नित्यं विद्याधनं सर्वधनप्रधानम्॥
    • अर्थ: इसे न चोर चुरा सकता है, न राजा छीन सकता है, न भाइयों में बाँटा जा सकता है और न ही यह भारी होता है। खर्च करने पर यह हमेशा बढ़ता ही है; इसीलिए विद्या रूपी धन सभी धनों में श्रेष्ठ है।
  • पुस्तकरूपा तु या विद्या परहस्तगतं च यद्धनम्।
    कार्यकाले समुत्पन्ने न सा विद्या न तद्धनम्॥
    • अर्थ: पुस्तक में रखी विद्या और दूसरे के हाथ में गया धन, ज़रूरत पड़ने पर काम नहीं आते।

🤝 संगति और मित्र (Company & Friends)

  • शैलशैले न माणिक्यं मौक्तिकं न गजे गजे।
    साधवो न हि सर्वत्र चन्दनं न वने वने॥
    • अर्थ: हर पहाड़ पर मणियाँ नहीं होतीं, हर हाथी के मस्तक पर मोती नहीं होता, सज्जन लोग हर जगह नहीं मिलते और हर वन में चन्दन का पेड़ नहीं होता।
  • उत्सवे व्यसने चैव दुर्भिक्षे राष्ट्रविप्लवे।
    राजद्वारे श्मशाने च यस्तिष्ठति स बान्धवः॥
    • अर्थ: जो उत्सव में, संकट में, अकाल में, राष्ट्र पर आए संकट में, राजदरबार में और श्मशान में साथ खड़ा रहता है, वही सच्चा मित्र (भाई) है।

💪 कर्म और परिश्रम (Hard Work)

  • उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः।
    न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः॥
    • अर्थ: कोई भी काम कड़ी मेहनत से ही पूरा होता है, सिर्फ सोचने (इच्छा करने) से नहीं। जैसे सोए हुए शेर के मुँह में हिरण खुद-ब-खुद प्रवेश नहीं करता।
  • आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः।
    नास्त्युद्यमसमो बन्धुः कृत्वा यं नावसीदति॥
    • अर्थ: मनुष्यों के शरीर में रहने वाला आलस्य ही उसका सबसे बड़ा दुश्मन है। परिश्रम जैसा कोई दूसरा मित्र नहीं है, क्योंकि मेहनत करने वाला कभी दुखी नहीं होता।

🌍 सज्जनता और स्वभाव (Goodness & Nature)

  • अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम्।
    उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्॥
    • अर्थ: ‘यह मेरा है और वह पराया है’—ऐसी सोच छोटे मन वाले लोगों की होती है। उदार चरित्र (बड़े दिल) वाले लोगों के लिए तो पूरी धरती ही एक परिवार है।
  • नमन्ति फलिनो वृक्षाः नमन्ति गुणिनो जनाः।
    शुष्कवृक्षाश्च मूर्खाश्च न नमन्ति कदाचन॥
    • अर्थ: फलों से लदे वृक्ष झुक जाते हैं और गुणी लोग भी झुकते हैं (नम्र होते हैं)। लेकिन सूखे पेड़ और मूर्ख लोग कभी नहीं झुकते।
  • परोपकाराय फलन्ति वृक्षाः परोपकाराय वहन्ति नद्यः।
    परोपकाराय दुहन्ति गावः परोपकारार्थमिदं शरीरम्॥
    • अर्थ: वृक्ष परोपकार के लिए फल देते हैं, नदियाँ दूसरों के लिए बहती हैं, गाएँ दूसरों के लिए दूध देती हैं और यह मानव शरीर भी परोपकार के लिए ही है।

विद्या और ज्ञान पर सुभाषित (Subhashitas on Knowledge)

  • विद्वत्त्वं च नृपत्त्वं च नैव तुल्यं कदाचन।
    स्वदेशे पूज्यते राजा विद्वान् सर्वत्र पूज्यते॥
    • अर्थ: एक विद्वान (ज्ञानी) और राजा की तुलना कभी नहीं की जा सकती। राजा को केवल अपने देश में सम्मान मिलता है, जबकि विद्वान की पूजा हर जगह होती है।
  • न चोरहार्यं न च राजहार्यं न भ्रातृभाज्यं न च भारकारि।
    व्यये कृते वर्धत एव नित्यं विद्याधनं सर्वधनप्रधानम्॥
    • अर्थ: ज्ञान रूपी धन को न चोर चुरा सकता है, न राजा छीन सकता है, न भाइयों में यह बंटता है और न ही यह भारी होता है। इसे जितना खर्च करो, यह उतना ही बढ़ता है। इसलिए विद्या का धन सभी धनों में श्रेष्ठ है।
  • पुस्तकरूपा तु या विद्या परहस्तगतं च यद्धनम्।
    कार्यकाले समुत्पन्ने न सा विद्या न तद्धनम्॥
    • अर्थ: पुस्तकों में रखी विद्या और दूसरों के हाथ में गया हुआ धन—जरूरत पड़ने पर न वह विद्या काम आती है और न वह धन।

🤝 मित्र और संगति पर सुभाषित (Subhashitas on Friendship & Company)

  • उत्सवे व्यसने चैव दुर्भिक्षे राष्ट्रविप्लवे।
    राजद्वारे श्मशाने च यस्तिष्ठति स बान्धवः॥
    • अर्थ: जो व्यक्ति खुशी में, संकट में, अकाल के समय, देश पर संकट आने पर, राजदरबार में और श्मशान में भी साथ खड़ा रहता है, वही सच्चा मित्र या भाई है।
  • पापान्निवारयति योजयते हिताय गुह्यं च गूहति गुणान् प्रकटीकरोति।
    आपद्गतं च न जहाति ददाति काले सन्मित्रलक्षणमिदं प्रवदन्ति सन्त:॥
    • अर्थ: सच्चा मित्र पाप से रोकता है, हित के काम में लगाता है, गुप्त बातों को छिपाता है, गुणों को प्रकट करता है, विपत्ति में साथ नहीं छोड़ता और जरूरत पड़ने पर मदद करता है। संतों ने सच्चे मित्र के यही लक्षण बताए हैं।

🌸 सज्जन और परोपकार पर सुभाषित (Subhashitas on Nobility & Charity)

  • परोपकाराय फलन्ति वृक्षाः परोपकाराय वहन्ति नद्यः।
    परोपकाराय दुहन्ति गावः परोपकारार्थमिदं शरीरम्॥
    • अर्थ: वृक्ष परोपकार (दूसरों) के लिए फल देते हैं, नदियाँ परोपकार के लिए बहती हैं, गाएँ परोपकार के लिए दूध देती हैं और यह मानव शरीर भी परोपकार के लिए ही है।
  • अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम्।
    उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्॥
    • अर्थ: “यह मेरा है और वह पराया है”—ऐसी सोच छोटे मन वाले लोगों की होती है। उदार चरित्र वाले (बड़े दिल वाले) लोगों के लिए तो पूरी धरती ही एक परिवार के समान होती है।

⏳ कर्म और परिश्रम पर सुभाषित (Subhashitas on Hard Work)

  • उद्यमेन ही सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः।
    न ही सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः॥
    • अर्थ: कोई भी काम कड़ी मेहनत (परिश्रम) से ही पूरा होता है, केवल इच्छा करने (सोचने) से नहीं। जैसे सोए हुए शेर के मुंह में हिरण खुद-ब-खुद प्रवेश नहीं करता, उसे भी शिकार के लिए प्रयास करना पड़ता है।
  • आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः।
    नास्त्युद्यमसमो बन्धुः कृत्वा यं नावसीदति॥
    • अर्थ: मनुष्यों के शरीर में रहने वाला ‘आलस्य’ ही उसका सबसे बड़ा दुश्मन है। परिश्रम जैसा कोई दूसरा मित्र नहीं है, क्योंकि मेहनत करने वाला कभी दुखी नहीं होता।

⚠️ मूर्ख और दुर्जन पर सुभाषित (Subhashitas on Fools & Wicked)

  • दुर्जनः परिहर्तव्यो विद्ययाऽलङ्कृतोऽपि सन्।
    मणिना भूषितः सर्पः किमसौ न भयङ्करः॥
    • अर्थ: दुष्ट व्यक्ति यदि पढ़ा-लिखा (विद्वान) भी हो, तो भी उसका त्याग कर देना चाहिए। क्या मणि से सुशोभित सांप खतरनाक नहीं होता? वह तब भी जहरीला ही रहता है।
  • मूर्खस्य पञ्च चिह्नानि गर्वो दुर्वचनं तथा।
    क्रोधश्च दृढवादश्च परवाक्येष्वनादरः॥
    • अर्थ: मूर्ख व्यक्ति के पांच लक्षण होते हैं—अहंकार करना, अपशब्द बोलना, बिना बात के गुस्सा होना, अपनी गलत बात पर अड़े रहना और दूसरों के विचारों का अनादर करना।

घटो जन्मस्थानं, मृगपरिजनो, भूर्जवसनं
वसः, कन्दादिकमशनमेवन्विद्गुणः।
अगस्त्यः पथोधिं यदकृत कर्मभोज-कुहरे
क्रियासिद्धिः सत्त्वे भवति महतां नोपकरणे ॥

रथस्यैकं चक्रं, भुजगयमिताः सप्त तुरगाः
निरालंबो मार्गाश्चरणविकलाः सारथिरपि।
रविर्यात्येवंतं दैनिकमपरस्य नभसः
क्रियासिद्धिः सत्त्वे भवति महतां, नोपकरणे ॥

विजेतव्या लंका, चरणतरणियो जलनिधि,-
रविपक्षः पौलस्त्यो, ऋण्भुवि सहायश्च कपयः।
तथापयेको रामः सकलमवधीद्राक्षस्कुलं
क्रियासिद्धिः सत्त्वे भवति महतां, नोपकरणे ॥

धनुः पुष्पं, मौर्वी मधुकरमयी, चंचलदृशां
दर्शनं कोणो बाणः, सुहृदपि जड़ात्मा हिमकरः।
स्वयं चाकोऽनङ्गः सकलभुवनं व्याकुलयति
क्रियासिद्धिः सत्त्वे भवति महतां, नोपकरणे ॥

नारियलः श्रीकण्ठो, जदतनुरमात्यः शशधरो
वसंतः सामंतः कुसुममीषवः सैन्यमबलाः।
तथापि त्रैलोक्यं जायति मदनो देहरहितः
क्रियासिद्धिः सत्त्वे भवति महतां, नोपकरणे ॥

या कुंडेन्दुतुशार्हारधवला या शुभ्रवस्त्रावृता
या वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना।
या ब्रह्माच्युतशंकरप्रभृतिभिः देवैः सदा वंदिता
सा मां पातु सरस्वती भगवती निःशेषजाद्यपहा॥

अविश्रमं वहेद्भारं शीतोष्णं च न विन्दति।
ससंतोषस्तथा नित्यं तृणि शिक्षेत् गर्दभत् ॥