सुभाषितानि

Subhashitani

प्रियवाक्यप्रदानेन सर्वे तुष्यन्ति जन्तवः।
तस्मात्तदेव वक्तव्यं वचने किं दरिद्रता॥

भावार्थ : प्रिय वाक्य यानी मीठी वाणी बोलने से सभी प्रसन्न होते हैं, इसलिए सदैव मीठी वाणी बोलने का प्रयत्न करना चाहिए। मीठी वाणी बोलने से कौन सी निर्धनता आ जाती है।

व्याख्या : कहने का तात्पर्य यह है कि सदैव विनम्र होकर मधुर भाषी रहना चाहिए और सबसे मीठी वाणी में बात करनी चाहिए। मीठी वाणी बोलने वाले व्यक्ति को सभी व्यक्ति पसंद करते हैं और सब उसका सही उत्तर देते हैं। किसी से विनम्र होकर मीठी वाणी बोलने से कोई निर्धनता नहीं आ जाती बल्कि मन प्रसन्न ही रहता है, क्योंकि उसका हमें सकारात्मक परिणाम जो प्राप्त होता है।


अग्निशेषमृणशेषं शत्रुशेषं तथैव च ।
पुन: पुन: प्रवर्धेत तस्माच्शेषं न कारयेत् ॥

भावार्थ : यदि कोई आग, ऋण, या शत्रु अल्प मात्रा अथवा न्यूनतम सीमा तक भी अस्तित्व में बचा रहेगा तो बार बार बढ़ेगा ; अत: इन्हें थोड़ा सा भी बचा नही रहने देना चाहिए । इन तीनों को सम्पूर्ण रूप से समाप्त ही कर डालना चाहिए।


नाभिषेको न संस्कार: सिंहस्य क्रियते मृगैः ।
विक्रमार्जितराज्यस्य स्वयमेव मृगेंद्रता ॥

भावार्थ : वन्य जीव शेर का राज्याभिषेक (पवित्र जल छिड़काव) तथा कतिपय कर्मकांड के संचालन के माध्यम से ताजपोशी नहीं करते किन्तु वह अपने कौशल से ही कार्यभार और राजत्व को सहजता व सरलता से धारण कर लेता है।


उद्यमेनैव हि सिध्यन्ति,कार्याणि न मनोरथै ।
न हि सुप्तस्य सिंहस्य,प्रविशन्ति मृगाः॥

भावार्थ : प्रयत्न करने से ही कार्य पूर्ण होते हैं, केवल इच्छा करने से नहीं, सोते हुए शेर के मुख में मृग स्वयं प्रवेश नहीं करते हैं।


विद्वत्वं च नृपत्वं च न एव तुल्ये कदाचन् ।
स्वदेशे पूज्यते राजा विद्वान् सर्वत्र पूज्यते॥

भावार्थ : विद्वता और राज्य अतुलनीय हैं, राजा को तो अपने राज्य में ही सम्मान मिलता है पर विद्वान का सर्वत्र सम्मान होता है ।


नाभिषेको न सङ्स्कारः सिंहस्य क्रियते वने ।
विक्रमार्जितसत्त्वस्य स्वयमेव मृगेंद्रता ॥

भावार्थ : वन्य जीव शेर का राज्याभिषेक (पवित्र जल छिड़काव) तथा कतिपय कर्मकांड के संचालन के माध्यम से ताजपोशी नहीं करते किन्तु वह अपने कौशल से ही कार्यभार और राजत्व को सहजता व सरलता से धारण कर लेता है।


तथाप्येको रामः सकलमवधीद्राक्षसकुलं ।
क्रियासिद्धिः सत्त्वे भवति महतां नोपकरणे॥

भावार्थ : आपदाओं के विरुद्ध श्री राम ने सभी राक्षसों का संहार किया। व्यक्ति की सफलता अपने क्षमताओं पर निर्भर करती है।


जलान्तश्चन्द्रचपलं जीवनं खलु देहिनाम् ।
तथाविधिमिति त्वाशाश्वत्कल्याणमाचरेत् ॥

भावार्थ : जिस प्रकार चन्द्रका प्रतिबिम्ब अस्थिर होता है उसी प्रकार मनुष्यका जीवन भी अनिश्चित और अस्थिर होता है। विधिके इस विधानको जानते हुए मनुष्यको ऐसे कार्य करते रहना चाहिए जिससे स्वयंका एवं समाजका शाश्वत कल्याण हो।


भो दारिद्रय: नमस्तुभ्यं धन्योहं तव प्रासादत: ।
पश्यामि जगत्सर्वं न तु मां पश्यति जगत्रय: ॥

भावार्थ : हे गरीबी! तुम्हें नमस्कार है। तुम्हारी कृपा से मैं धन्य हो गया हूँ। मैं पूरे संसार को देख सकता हूँ, पर तीनों लोकों के प्राणी (या कोई भी) मुझे नहीं देख सकता।


प्रासन्नतां या न गताभिषेकत: तथा न मम्ले वनवास दु:खत: ।
मुखाम्बुज श्री रघु नन्दनस्य मे सदास्तु सा मंजुल मंगल प्रद ॥

भावार्थ : वह सुंदरता जो राज्याभिषेक की ख़ुशी में बहुत ज्यादा प्रसन्न नहीं हुई और न ही वनवास के दुख से कभी मलिन हुई।श्री राम के मुखकमल की वह छवि हमेशा मेरे लिए रहे। जो हमेशा सुख और मंगल देने वाली है।


पृथिव्यां त्रीणि रत्नानि जलमन्नं सुभाषितम् ।
मूढै: पाषाणखण्डेषु रत्नसंज्ञा प्रदीयते ॥

भावार्थ : पृथ्वी पर तीन ही रत्न हैं जल अन्न और अच्छे वचन । फिर भी मूर्ख पत्थर के टुकड़ों को रत्न कहते हैं ।


पातितोऽपि कराघातै-रुत्पतत्येव कन्दुकः।
प्रायेण साधुवृत्तानाम-स्थायिन्यो विपत्तयः॥

भावार्थ : हाथ से पटकी हुई गेंद भी भूमि पर गिरने के बाद ऊपर की ओर उठती है, सज्जनों का बुरा समय अधिकतर थोड़े समय के लिए ही होता है।


सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयात् न ब्रूयात् सत्यमप्रियं ।
प्रियं च नानृतं ब्रूयात् एष धर्मः सनातनः॥

भावार्थ : सत्य बोलें, प्रिय बोलें पर अप्रिय सत्य न बोलें और प्रिय असत्य न बोलें, ऐसी सनातन रीति है।


मूर्खस्य पञ्च चिन्हानि गर्वो दुर्वचनं तथा ।
क्रोधश्च दृढवादश्च परवाक्येष्वनादरः॥

भावार्थ : मूर्खों के पाँच लक्षण हैं – गर्व, अपशब्द, क्रोध, हठ और दूसरों की बातों का अनादर।


अतितॄष्णा न कर्तव्या तॄष्णां नैव परित्यजेत् ।
शनै: शनैश्च भोक्तव्यं स्वयं वित्तमुपार्जितम् ॥

भावार्थ : अधिक इच्छाएं नहीं करनी चाहिए पर इच्छाओं का सर्वथा त्याग भी नहीं करना चाहिए। अपने कमाये हुए धन का धीरे-धीरे उपभोग करना चाहिये।


अग्निशेषम् ऋणशेषम् शत्रुशेषम् तथैव च ।
पुन: पुन: प्रवर्धेत तस्मात् शेषम् न कारयेत्॥

भावार्थ : यदि कोई आग, ऋण, या शत्रु अल्प मात्रा अथवा न्यूनतम सीमा तक भी अस्तित्व में बचा रहेगा तो बार बार बढ़ेगा ; अत: इन्हें थोड़ा सा भी बचा नही रहने देना चाहिए । इन तीनों को सम्पूर्ण रूप से समाप्त ही कर डालना चाहिए।


अविश्रामं वहेद् भारं शीतोष्णं च न विन्दति।
ससंतोषस्तथा नित्यं त्रीणि शिक्षेत गर्दभात्॥

भावार्थ : मनुष्य को बिना विश्राम किए बोझ उठाना चाहिए, उसे सर्दी या गर्मी का अनुभव नहीं होना चाहिए। उसे गधे की तरह सदैव संतुष्ट रहना चाहिए।


दु:संग सर्वथैव त्याज्य:।
कामर् क्रोधर् मोहर् स्मॄतिभ्रंशर् बुद्धिनाशर् सर्वनाशर् कारणत्वात् ।
तरंगायिता अपीमे संगात् समुद्रायन्ति॥

भावार्थ : बुरे और दुष्ट लोगों की संगति हर हाल में छोड़ दो। क्योंकि इससे इच्छाएँ उत्पन्न होंगी, इन इच्छाओं की पूर्ति न होने पर क्रोध और मोह उत्पन्न होंगे और इसी क्रम में आगे चलकर बुद्धि का नाश होगा और अंततः पूर्ण विनाश होगा। बुरे गुण, भले ही मानव मन में छोटी-छोटी लहरों की तरह, अल्प मात्रा में मौजूद हों, अंततः बुरे और दुष्ट लोगों की संगति के कारण एक विशाल महासागर में विकसित हो जाएँगे।


क्षमा बलमशक्तानाम् शक्तानाम् भूषणम् क्षमा।
क्षमा वशीकृते लोके क्षमयाः किम् न सिद्ध्यति॥

भावार्थ : क्षमा निर्बलों का बल है, क्षमा बलवानों का आभूषण है, क्षमा ने इस विश्व को वश में किया हुआ है, क्षमा से कौन सा कार्य सिद्ध नहीं हो सकता है।


आयुषः क्षण एकोऽपि सर्वरत्नैर्न न लभ्यते।
नीयते स वृथा येन प्रमादः सुमहानहो ॥

भावार्थ : आयु का एक क्षण भी सारे रत्नों को देने से प्राप्त नहीं किया जा सकता है, अतः इसको व्यर्थ में नष्ट कर देना महान असावधानी है।


नारिकेलसमाकारा दृश्यन्तेऽपि हि सज्जनाः।
अन्ये बदरिकाकारा बहिरेव मनोहराः॥

भावार्थ : सज्जन व्यक्ति नारियल के समान होते हैं, अन्य तो बदरी फल के समान केवल बाहर से ही अच्छे लगते हैं ।


उदये सविता रक्तो रक्त:श्चास्तमये तथा।
सम्पत्तौ च विपत्तौ च महतामेकरूपता॥

भावार्थ : उदय होते समय सूर्य लाल होता है और अस्त होते समय भी लाल होता है, सत्य है महापुरुष सुख और दुःख में समान रहते हैं।


दर्शने स्पर्शणे वापि श्रवणे भाषणेऽपि वा।
यत्र द्रवत्यन्तरङ्गं स स्नेह इति कथ्यते॥

भावार्थ : यदि किसी को देखने से या स्पर्श करने से, सुनने से या बात करने से हृदय द्रवित हो तो इसे स्नेह कहा जाता है।


नास्ति विद्या समं चक्षु नास्ति सत्य समं तप:।
नास्ति राग समं दुखं नास्ति त्याग समं सुखं॥

भावार्थ : विद्या के समान आँख नहीं है, सत्य के समान तपस्या नहीं है, आसक्ति के समान दुःख नहीं है और त्याग के समान सुख नहीं है।


यः पठति लिखति पश्यति परिपृच्छति पंडितान् उपाश्रयति।
तस्य दिवाकरकिरणैः नलिनी दलं इव विस्तारिता बुद्धिः॥

भावार्थ : जो पढ़ता है, लिखता है, देखता है, प्रश्न पूछता है, बुद्धिमानों का आश्रय लेता है, उसकी बुद्धि उसी प्रकार बढ़ती है जैसे कि सूर्य किरणों से कमल की पंखुड़ियाँ।


विदेशेषु धनं विद्या व्यसनेषु धनं मति:।
परलोके धनं धर्म शीलं सर्वत्र वै धनम्॥

भावार्थ : विदेश में विद्या धन है, संकट में बुद्धि धन है, परलोक में धर्म धन है और शील सर्वत्र ही धन है।


प्रदोषे दीपकश्चंद्र प्रभाते दीपको रवि:।
त्रैलोक्ये दीपको धर्म सुपुत्र: कुलदीपक:॥

भावार्थ : शाम को चन्द्रमा प्रकाशित करता है, दिन को सूर्य प्रकाशित करता है, तीनों लोकों को धर्म प्रकाशित करता है और सुपुत्र पूरे कुल को प्रकाशित करता है।


भावार्थ : आठ गुण पुरुष को सुशोभित करते हैं – बुद्धि, सुन्दर चरित्र, आत्म-नियंत्रण, शास्त्र-अध्ययन, साहस, मितभाषिता, यथाशक्ति।


न ही कश्चित् विजानाति किं कस्य श्वो भविष्यति।
अतः श्वः करणीयानि कुर्यादद्यैव बुद्धिमान्॥

भावार्थ : कल क्या होगा यह कोई नहीं जानता है इसलिए कल के करने योग्य कार्य को आज कर लेने वाला ही बुद्धिमान है।


क्षणशः कणशश्चैव विद्यामर्थं च साधयेत् ।
क्षणत्यागे कुतो विद्या कणत्यागे कुतो धनम्॥

भावार्थ : क्षण-क्षण विद्या के लिए और कण-कण धन के लिए प्रयत्न करना चाहिए। समय नष्ट करने पर विद्या और साधनों के नष्ट करने पर धन कैसे प्राप्त हो सकता है।


गते शोको न कर्तव्यो भविष्यं नैव चिन्तयेत् ।
वर्तमानेन कालेन वर्तयन्ति विचक्षणाः॥

भावार्थ : बीते हुए समय का शोक नहीं करना चाहिए और भविष्य के लिए परेशान नहीं होना चाहिए, बुद्धिमान तो वर्तमान में ही कार्य करते हैं।


विदेशेषु धनं विद्या व्यसनेषु धनं मतिः ।
परलोके धनं धर्मः शीलं सर्वत्र वै धनम् ॥

भावार्थ : विदेश में विद्या धन, संकट में मति धन, परलोक में धर्म धन होता है । पर, शील तो सब जगह धन है।


कीटोऽपि सुमनःसंगादारोहति सतां शिरः ।
अश्मापि याति देवत्वं महद्भिः सुप्रतिष्ठितः ॥

भावार्थ : पुष्प के संग से कीडा भी अच्छे लोगों के मस्तक पर चढता है । बडे लोगों से प्रतिष्ठित किया गया पत्थर भी देव बनता है।


शुश्रूषा श्रवणं चैव ग्रहणं धारणां तथा ।
ऊहापोहोऽर्थ विज्ञानं तत्त्वज्ञानं च धीगुणाः॥

भावार्थ : शुश्रूषा, श्रवण, ग्रहण, धारण, चिंतन, उहापोह, अर्थविज्ञान, और तत्त्वज्ञान – ये बुद्धि के गुण हैं।


सन्तोषः परमं सौख्यं सन्तोषः परममृतम् ।
सन्तोषः परमं पथ्यं सन्तोषः परमं हितम् ॥

भावार्थ : संतोष, यह परम् सौख्य, परम् अमृत, परम् पथ्य और परम् हितकारक है।


सन्तोषः परमो लाभः सत्सङ्गः परमा गतिः ।

विचारः परमं  ज्ञानं शमो हि परमं सुखम् ॥भावार्थ : संतोष परम् बल है, सत्संग परम् गति है, विचार परम्  ज्ञान है, और शम परम् सुख है।


न मुक्ताभि र्न माणिक्यैः न वस्त्रै र्न परिच्छदैः ।
अलङ्कियेत शीलेन केवलेन हि मानवः ॥

भावार्थ : मोती, माणेक, वस्त्र या पहनावे से नहीं, पर केवल शील से हि इन्सान विभूषित होता है।


शौचानां परमं शौचं गुणानां परमो गुणः ।
प्रभावो महिमा धाम शीलमेकं जगत्त्रये ॥

भावार्थ : तीनों लोकों में एक शील ही परम् पवित्र चीझ, गुणों में श्रेष्ठ गुण, महिमा का धाम और प्रभाव है।


यावद्वित्तोपार्जनसक्तः तावन्निजपरिवारो रक्तः।
पश्चाज्जीवति जर्जरदेहे वार्तां कोऽपि न पृच्छति गेहे॥

भावार्थ : जब तक व्यक्ति धनोपार्जन में समर्थ है, तब तक परिवार में सभी उसके प्रति स्नेह प्रदर्शित करते हैं परन्तु अशक्त हो जाने पर उसे सामान्य बातचीत में भी नहीं पूछा जाता है।


धॄतिः क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः ।
धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम् ॥

भावार्थ : धर्म के दस लक्षण हैं – धैर्य, क्षमा, आत्म-नियंत्रण, चोरी न करना, पवित्रता, इन्द्रिय-संयम, बुद्धि, विद्या, सत्य और क्रोध न करना।


यथा हि एकेन चक्रेण न रथस्य गतिर्भवेत्।
एवं पुरूषकारेण विना दैवं न सिध्यति ॥

भावार्थ : जिस प्रकार एक पहिये वाले रथ की गति संभव नहीं है, उसी प्रकार पुरुषार्थ के बिना केवल भाग्य से कार्य सिद्ध नहीं होते हैं।


अभिवादनशीलस्य नित्यं वॄद्धोपसेविनः ।
चत्वारि तस्य वर्धन्ते आयुर्विद्या यशो बलम् ॥

भावार्थ : विनम्र और नित्य अनुभवियों की सेवा करने वाले में चार गुणों का विकास होता है – आयु, विद्या, यश और बल।


नलिनीदलगतजलमतितरलम् तद्वज्जीवितमतिशयचपलम्।
विद्धि व्याध्यभिमानग्रस्तं लोक शोकहतं च समस्तम् ॥

भावार्थ : जीवन कमल-पत्र पर पड़ी हुई पानी की बूंदों के समान अनिश्चित एवं अल्प है। यह समझ लो कि समस्त विश्व रोग, अहंकार और दु:ख में डूबा हुआ है।


चित्तोद्वेगं विधायापि हरिर्यद्यत् करिष्यति ।
तथैव तस्य लीलेति मत्वा चिन्तां द्रुतं त्यजेत ॥

भावार्थ : चिंता और उद्वेग में संयम रख कर और ऐसा मान कर कि श्रीहरि जो जो भी करेंगे वह उनकी लीला मात्र है, चिंता को शीघ्र त्याग दें।


क्रोधो वैवस्वतो राजा तॄष्णा वैतरणी नदी।
विद्या कामदुघा धेनुः सन्तोषो नन्दनं वनम् ॥

भावार्थ : क्रोध यमराज के समान है और तृष्णा नरक की वैतरणी नदी के समान। विद्या सभी इच्छाओं को पूरी करने वाली कामधेनु है और संतोष स्वर्ग का नंदन वन है।


लोभमूलानि पापानि संकटानि तथैव च।
लोभात्प्रवर्तते वैरं अतिलोभात्विनश्यति ॥

भावार्थ : लोभ पाप और सभी संकटों का मूल कारण है, लोभ शत्रुता में वृद्धि करता है, अधिक लोभ करने वाला विनाश को प्राप्त होता है।


अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम्।
उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्॥

भावार्थ : यह अपना है और यह पराया है,” ऐसी सोच छोटे दिल (संकुचित मन) वाले लोग रखते हैं। बड़े दिल वाले उदार लोगों के लिए तो पूरी पृथ्वी ही उनका परिवार (कुटुम्ब) है।


आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महाद्विपः।
नास्त्युद्यमोसमः बन्धुः कृत्वा यं नावसीदति॥

भावार्थ : मनुष्य के शरीर में रहने वाला आलस्य ही उसका सबसे बड़ा शत्रु है। परिश्रम (उद्यम) जैसा दूसरा कोई मित्र नहीं है, क्योंकि परिश्रम करने वाला कभी दुखी नहीं होता।


अज्ञानतिमिरांधस्य ज्ञानांजनशलाकया।
चक्षुरुन्मीलितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः॥

भावार्थ : अज्ञान रूपी अंधकार से अंधे हो चुके मनुष्य के नेत्रों को ज्ञान रूपी अंजन (सुरमा/सलाका) से खोलने वाले (ज्ञान का प्रकाश देने वाले) गुरु को मेरा प्रणाम है।


क्षमा शस्त्रं करे यस्य दुर्जनः किं करिष्यति।
अतृणे पतितो वन्हिः स्वयमेवोपशाम्यति॥

भावार्थ : जिसके हाथ में क्षमा रूपी शस्त्र है, उसका कोई बुरा व्यक्ति (दुर्जन) क्या बिगाड़ सकता है? जैसे तिनकों के बिना (घास-फूस रहित स्थान पर) गिरी हुई आग अपने आप शांत हो जाती है, वैसे ही दुर्जन का क्रोध भी खुद-ब-खुद शांत हो जाता है।


कलहान्तानि हम्र्याणि कुवाक्यानां च सौहृदम् |
कुराजान्तानि राष्ट्राणि कुकर्मांन्तम् यशो नॄणाम् ||

भावार्थ : झगडों से परिवार टूट जाते है | गलत शब्द के प्रयोग करने से दोस्ती टूट जाती है । बुरे शासकों के कारण राष्ट्र का नाश होता है| बुरे काम करने से यश दूर भागता है।


दुर्लभं त्रयमेवैतत् देवानुग्रहहेतुकम् ।
मनुष्यत्वं मुमुक्षुत्वं महापुरुषसंश्रय: ॥

भावार्थ : मनुष्य जन्म, मुक्ति की इच्छा तथा महापुरूषों का सहवास यह तीन चीजें परमेश्वर की कृपा पर निर्भर रहते है।


सुखार्थी त्यजते विद्यां विद्यार्थी त्यजते सुखम् ।
सुखार्थिन: कुतो विद्या कुतो विद्यार्थिन: सुखम् ॥

भावार्थ : जो व्यक्ती सुख के पीछे भागता है उसे ज्ञान नहीं मिलेगा । तथा जिसे ज्ञान प्राप्त करना है वह व्यक्ति सुख का त्याग करता है । सुख के पीछे भागने वाले को विद्या कैसे प्राप्त होगी ? तथा जिस को विद्या प्रप्त करनी है उसे सुख कैसे मिलेगा?


दिवसेनैव तत् कुर्याद् येन रात्रौ सुखं वसेत् ।
यावज्जीवं च तत्कुर्याद् येन प्रेत्य सुखं वसेत् ॥

दिनभर ऐसा काम करो जिससे रात में चैन की नींद आ सके । वैसे ही जीवनभर ऐसा काम करो जिस‌ से मृत्यु पश्चात् सुख मिले अर्थात् सद्गति प्राप्त हो।


उपार्जितानां वित्तानां त्याग एव हि रक्षणम्
तडागोदरसंस्थानां परीवाह इवाम्भसाम्

भावार्थ : कमाए हुए धन का त्याग करने से ही उसका रक्षण होता है । जैसे तालब का पानी बहते रहने सेे ही तालाब साफ रहता है।


खल: सर्षपमात्राणि पराच्छिद्राणि पश्यति ।
आत्मनो बिल्वमात्राणि पश्यन्नपि न पश्यति ॥

भावार्थ : दुष्ट मनुष्य को दुसरे के भीतर के राइ इतने भी दोष दिखार्इ देते है परन्तू अपने अंदर के बिल्वपत्र जैसे बडे दोष नही दिखार्इ पडते।


दानं भोगो नाश: तिस्त्रो गतयो भवन्ति वित्तस्य ।
यो न ददाति न भुङ्क्ते तस्य तॄतीया गतिर्भवति ॥

भावार्थ : धन खर्च होने के तीन मार्ग है । दान,उपभोग तथा नाश । जो व्यक्ति दान नही करता तथा उसका उपभोगभी नही लेता उसका धन नाश पाता है।


यादॄशै: सन्निविशते यादॄशांश्चोपसेवते ।
यादॄगिच्छेच्च भवितुं तादॄग्भवति पूरूष: ॥

भावार्थ : मनुष्य , जिस प्रकारके लोगोंके साथ रहता है , जिस प्रकारके लोगोंकी सेवा करता है , जिनके जैसा बनने की इच्छा करता है , वैसा वह होता है।


गुणी गुणं वेत्ति न वेत्ति निर्गुणो, बली बलं वेत्ति न वेत्ति निर्बल: ।
पिको वसन्तस्य गुणं न वायस:, करी च सिंहस्य बलं न मूषक: ॥

भावार्थ : गुणी पुरुष ही दूसरे के गुण पहचानता है, गुणहीन पुरुष नही। बलवान पुरुष ही दूसरे का बल जानता है, बलहीन नही। वसन्त ऋतु आए तो उसे कोयल पहचानती है, कौआ नही। शेर के बल को हाथी पहचानता है, चूहा नही।


गुणवान् वा परजन: स्वजनो निर्गुणोपि वा निर्गुण: स्वजन: श्रेयान् य: पर: पर एव च

भावार्थ : गुणवान शत्रु से भी गुणहीन मित्र अच्छा। शत्रु तो आखिर शत्रु है।


पदाहतं सदुत्थाय मूर्धानमधिरोहति ।
स्वस्थादेवाबमानेपि देहिनस्वद्वरं रज: ॥

भावार्थ : जो पैरों से कुचलने पर भी उपर उठता है ऐसा मिट्टी का कण अपमान किए जाने पर भी चुप बैठने वाले व्यक्ति से श्रेष्ठ है।


सा भार्या या प्रियं बू्रते स पुत्रो यत्र निवॄति: ।
तन्मित्रं यत्र विश्वास: स देशो यत्र जीव्यते ॥

भावार्थ : जो मिठी वाणी में बोले वही अच्छी पत्नी है, दुसरोंके गुण पहचाननेवाले थोडे ही है । निर्धन से नाता रखनेवाले भी थोडे है । दुसरों के काम मे मग्न हानेवाले थोडे है तथा दुसरों का दु:ख देखकर दु:खी होने वाले भी थोडे है।


आरोग्यं विद्वत्ता सज्जनमैत्री महाकुले जन्म ।
स्वाधीनता च पुंसां महदैश्वर्यं विनाप्यर्थे: ॥

भावार्थ : आरोग्य, विद्वत्ता, सज्जनोंसे मैत्री, श्रेष्ठ कुल में जन्म, दुसरों के उपर निर्भर न होना यह सब धन नही होते हुए भी पुरूषों का एैश्वर्य है।


कालो वा कारणं राज्ञो राजा वा कालकारणम्
इति ते संशयो मा भूत् राजा कालस्य कारणं।

भावार्थ : काल राजा का कारण है कि राजा काल काÆ इसमे थोडीभी दुविधा नही कि राजाही काल का कारण है।


आयुष: क्षण एकोपि सर्वरत्नैर्न लभ्यते ।
नीयते तद् वॄथा येन प्रमाद: सुमहानहो ॥

भावार्थ : सब रत्न देने पर भी जीवन का एक क्षण भी वापास नही मिलता । ऐसे जीवन के क्षण जो निर्थक ही खर्च कर रहे है वे कितनी बडी गलती कर रहे है।


योजनानां सहस्रं तु शनैर्गच्छेत् पिपीलिका ।
आगच्छन् वैनतेयोपि पदमेकं न गच्छति ॥

भावार्थ : यदि चिटी चल पडी तो धीरे धीरे वह एक हजार योजनाएं भी चल सकती है । परन्तु यदि गरूड जगह से नही हीला तो वह एक पग भी आगे नही बढ सकता।


कन्या वरयते रुपं माता वित्तं पिता श्रुतम् बान्धवा: कुलमिच्छन्ति मिष्टान्नमितरेजना:

भावार्थ : विवाह के समय कन्या सुन्दर पती चाहती है| उसकी माताजी सधन जमाइ चाहती है। उसके पिताजी ज्ञानी जमाइ चाहते है|तथा उसके बन्धु अच्छे परिवार से नाता जोडना चाहते है। परन्तु बाकी सभी लोग केवल अच्छा खाना चाहते है।


अर्था भवन्ति गच्छन्ति लभ्यते च पुन: पुन: पुन: कदापि नायाति गतं तु नवयौवनम्।

भावार्थ : घन मिलता है, नष्ट होता है| (नष्ट होने के बाद) फिरसे मिलता है। परन्तु जवानी एक बार निकल जाए तो कभी वापस नही आती।


आशा नाम मनुष्याणां काचिदाश्चर्यशॄङखला ।
यया बद्धा: प्राधावन्ति मुक्तास्तिष्ठन्ति पङ्गुवत् ॥

भावार्थ : आशा नामक एक विचित्र और आश्चर्यकारक शॄंखला है । इससे जो बंधे हुए है वो इधर उधर भागते रहते है तथा इससे जो मुक्त है वो पंगु की तरह शांत चित्त से एक हीसूक्ति जगह पर खडे रहते है।


शास्त्राण्यधीत्यापि भवन्ति मूर्खा यस्तु क्रियावान् पुरूष: स विद्वान् ।
सुचिन्तितं चौषधमातुराणां न नाममात्रेण करोत्यरोगम् ॥

भावार्थ : शास्त्रों का अध्ययन करने के बाद भी लोग मूर्ख रहते है । परन्तु जो कॄतीशील है वही सही अर्थ से विद्वान है । किसी रोगी के प्राती केवल अच्छी भावनासे निश्चित किया गया औषध रोगी को ठिक नही कर सकता । वह औषध नियमानुसार लेनेपर ही वह रोगी ठिक हो सकता है।


वॄत्तं यत्नेन संरक्ष्येद् वित्तमेति च याति च ।
अक्षीणो वित्तत: क्षीणो वॄत्ततस्तु हतो हत: ॥

भावार्थ : सदाचार की मनुष्यने प्रयन्तपूर्व रक्षा करनी चाहिए , वित्त तो आता जाता रहता है । धनसे क्षीण मनुष्य वस्तुत: क्षीण नही , बल्कि सद्वर्तनहीन मनुष्य हीन है।


परस्य पीडया लब्धं धर्मस्योल्लंघनेन च आत्मावमानसंप्राप्तं न धनं तत् सुखाय वै

भावार्थ : दुसरोंको दु:ख देकर , धर्मका उल्लंघन करकर या खुद का अपमान सहकर मिले हुए धन से सुख नही प्राप्त होता।


जानामि धर्मं न च मे प्रावॄत्ति: ।
जानाम्यधर्मं न च मे निवॄत्ति: ॥

भावार्थ : दुर्योधन कहते है “ऐसा नही की धर्म तथा अधर्म क्या है यह मैं नही जानता था । परन्तू ऐसा होने पर भी धर्म के मार्ग पर चलना यह मेरी प्रावॄत्ती नही बन पायी और अधर्म के मार्ग से मैं निवॄत्त भी नही हो सका।


अकॄत्वा परसन्तापं अगत्वा खलसंसदं अनुत्सॄज्य सतांवर्तमा यदल्पमपि तद्बहु

भावार्थ : दूसरोंको दु:ख दिये बिना ; विकॄती के साथ अपाना संबंध बनाए बिना ; अच्छों के साथ अपने सम्बंध तोडे बिना ; जो भी थोडा कुछ हम धर्म के मार्ग पर चलेंगे उतना पर्याप्त है।


परोपदेशे पांडित्यं सर्वेषां सुकरं नॄणाम् धर्मे स्वीयमनुष्ठानं कस्यचित् सुमहात्मन:

भावार्थ : दूसरोंको उपदेश देकर अपना पांडित्य दिखाना बहौत सरल है। परन्तु केवल महान व्यक्तिही उसतरह से (धर्मानुसार)अपना बर्ताव रख सकता है।


अमित्रो न विमोक्तव्य: कॄपणं व*णपि ब्राुवन् कॄपा न तस्मिन् कर्तव्या हन्यादेवापकारिणाम्।

भावार्थ : शत्रु अगर क्षमायाचना करे, तो भी उसे क्षमा नही करनी चाहिये| वह अपने जीवित को हानि पहुचा सकता है यह सोचके उसको समाप्त करना चाहिये।


नेह चात्यन्त संवास: कर्हिचित् केनचित् सह ।
राजन् स्वेनापि देहेन किमु जायात्मजादिभि: ॥

भावार्थ : हे राजा धृतराष्ट्र ! इस जगत में कभी भी , किसी का किसी से चिरंतन संबंध नहीं होता । अपना खुद के देह से तक नहीं , तो पत्नी और पुत्र की बात तो दूर ही है।


इंद्रियाणि पराण्याहु: इंद्रियेभ्य: परं मन: ।
मनसस्तु परा बुद्धि: यो बुद्धे: परतस्तु स: ॥

भावार्थ : इंद्रियों के परे मन है , मन के परे बुद्धि है और बुद्धि के भी परे आत्मा है।


वहेदमित्रं स्कन्धेन यावत्कालविपर्यय: अथैवमागते काले भिन्द्याद् घटमिवाश्मनि

भावार्थ : जब काल विपरीत हो, तब शत्रु को भी कन्धों पे उठाना चाहिये। अनुकूल काल आने पर उसे , जैसे घट पत्थर पे फोड जाता है , वैसे नष्ट करना चाहिये।


उष्ट्राणां च विवाहेषु गीतं गायन्ति गर्दभा: परस्परं प्रशंसन्ति अहो रुपमहो ध्वनि:

भावार्थ : उंटोके विवाहमे गधे गाना गा रहे हैं। दोनो एक दूसरेकी प्रशंसा कर रहे हैं वाह क्या रुप है (उंट का), वाह क्या आवाज है (गधेकी)। वास्तव मे देखा जाए तो उंटों मे सौंदर्य के कोई लक्षण नही होते, न की गधोंमे अच्छी आवाजके| परन्तु कुछ लोगोंने कभी उत्तम क्या है यही देखा नही होता| ऐसे लोग इस तरह से जो प्रशंसा करने योग्य नही है, उसकी प्रशंसा करते हैं।


आपूर्यमाणमचलप्रातिष्ठं समुद्रमाप: प्राविशन्ति यद्वत् ।
तद्वत् कामा यं प्राविशन्ति सर्वे स शान्तिमाप्नोति न कामकामी ॥

भावार्थ : जो व्यक्ती समय समय पर मन में उत्पन्न हुइ आशाओं से अविचलित रहता हैर् जैसे अनेक नदीयां सागर में मिलने पर भी सागर का जल नही बढता, वह शांत ही रहता हैर् ऐसे ही व्यक्ती सुखी हो सकते है।


मैत्री करूणा मुदितोपेक्षाणां। सुख दु:ख पुण्यापुण्य विषयाणां। भावनातश्चित्तप्रासादनम्। पातञ्जल योग

भावार्थ : आनंदमयता, दूसरे का दु:ख देखकर मन में करूणा, दूसरे का पुण्य तथा अच्छे कर्म समाज सेवा आदि देखकर आनंद का भाव, तथा किसी ने पाप कर्म किया तो मन में उपेक्षा का भाव ‘किया होगा छोडो’ आदि प्रातिक्रियाएँ उत्पन्न होनी चाहिए।


न प्रहॄष्यति सन्माने नापमाने च कुप्यति ।
न क्रुद्ध: परूषं ब्रूयात् स वै साधूत्तम: स्मॄत: ॥

भावार्थ : जो सम्मान से गर्वित नहीं होते , अपमान से क्रोधित नहीं होते क्रोधित होकर भी जो कठोर नहीं बोलते, वे ही श्रेष्ठ साधु है।


हर्षस्थान सहस्राणि भयस्थान शतानि च ।
दिवसे दिवसे मूढं आविशन्ति न पंडितम् ॥

भावार्थ : मूर्ख मनुष्य के लिए प्राति दिन हर्ष के सौ कारण होते है तथा दु:ख के लिए सहस्र कारण| परन्तु पंडितों के मन का संतुलन ऐसे छोटे कारणों से नही बिगडता।


एका केवलमर्थसाधनविधौ सेना शतेभ्योधिका नन्दोन्मूलन दॄष्टवीर्यमहिमा बुद्धिस्तु मा गान्मम ॥

भावार्थ : जिन्हे छोडकर जाना था वे चले गए| जो छोड कर जाना चाहते है वे भी चले जाए कोइ चिंता की बात नही| परन्तू इप्सित प्रााप्त करने में जो सैंकडो सेनाओं से भी अधिक बलवान है और नन्द साम्राज्य के निर्मूलन के कार्य में जिसके प्राताप को दुनीया ने देखा है वह केवल मेरी बुद्धि मुझे छोडकर न जाए।


दीर्घा वै जाग्रतो रात्रि: दीर्घं श्रान्तस्य योजनम् ।
दीर्घो बालानां संसार: सद्धर्मम् अविजानताम् ॥

भावार्थ : रातभर जागनेवाले को रात बहुत लंबी मालूम होती है । जो चलकर थका है, उसे एक योजन ह्मचार मील अंतर भी दूर लगता है । सद्धर्म का जिन्हे ज्ञान नही है उन्हे जिन्दगी दीर्घ लगती है।


देहीति वचनद्वारा देहस्था पञ्च देवता: ।
तत्क्षणादेव लीयन्ते धीह्रीश्रीकान्तिकीर्तय: ॥

भावार्थ : ‘दे’ इस शब्द के साथ , याचना करने से देहमें स्थित पांच देवता बुद्धी, लज्जा , लक्ष्मी , कान्ति , और कीर्ति उसी क्षण देह छोडकर जाती है।


यद्यत् परवशं कर्मं तत् तद् यत्नेन वर्जयेत् यद्यदात्मवशं तु स्यात् तत् तत् सेवेत यत्नत:

भावार्थ : जिस काम मै दुसरोंका सहाय्य लेना पडे, ऐसे काम को टालो। (परन्तु) जिसमे दुसरोंका सहाय्य न लेना पडे, ऐसे काम शीघ्रातासे पुरे करो।


सर्वं परवशं दु:खं सर्वमात्मवशं सुखम् एतद्विद्यात् समासेन लक्षणं सुखदु:खयो:

भावार्थ : दुसरोंपे निर्भर रहना सर्वथा दुखका कारण होता है। आत्मनिर्भर होना सर्वथा सुखका कारण होता है। सारांश, सुख–दु:ख के ये कारण ध्यान मे रखें।


यस्य भार्या गॄहे नास्ति साध्वी च प्रिायवादिनी ।
अरण्यं तेन गन्तव्यं यथाऽरण्यं तथा गॄहम् ॥

भावार्थ : जिस घर में गॄहिणी साध्वी प्रावॄत्ती की न हो तथा मॄदु भाषी न हो ऐसे घर के गॄहस्त ने घर छोड कर वन में जाना चाहिए क्यों की उसके घर में तथा वन में कोइ अंतर नही है।


अकॄत्यं नैव कर्तव्य प्रााणत्यागेऽपि संस्थिते ।
न च कॄत्यं परित्याज्यम् एष धर्म: सनातन: ॥

भावार्थ : जो कार्य करने योग्य नही है इअच्छा न होने के कारणउ वह प्रााण देकर भी नही करना चाहिए । तथा जो काम करना है इअपना कर्तव्य होने के कारणउ वह काम प्रााण देना पडे तो भी करना नही छोडना चाहिए ।


ध्यायतो विषयान् पुंस: संगस्तेषूपजायते ।
संगात् संजायते काम: कामात् क्रोधोऽभिजायते ॥

भावार्थ : विषयों का ध्यान करने से उनके प्रति आसक्ति हो जाती है यह आसक्ति ही कामना को जन्म देती है और कामना ही क्रोध को जन्म देती है।


नात्यन्त गुणवत् किंचित् न चाप्यत्यन्तनिर्गुणम् उभयं सर्वकार्येषु दॄष्यते साध्वसाधु वा

भावार्थ : ऐसा कोई भी कार्य नही है जो सर्वथा अच्छा है। ऐसा कोई भी कार्य नही जो सर्वथा बुरा है। अच्छे और बुरे गुण हर एक कार्य मै होते ही है।


एकत: क्रतव: सर्वे सहस्त्रवरदक्षिणा ।
अन्यतो रोगभीतानां प्रााणिनां प्रााणरक्षणम् ॥

भावार्थ : महाभारत एक ओर विधीपूर्वक सब को अच्छी दक्षिणा दे कर किया गया यज्ञ कर्म तथा दूसरी ओर दु:खी और रोग से पिडीत मनुष्य की सेवा करना यह दोनों भी कर्म उतने ही पुण्यप्राद है।


मातॄवत्परदारेषु परद्रव्येषु लोष्टवत् ।
आत्मवत्सर्वभूतेषु य: पश्यति स पश्यति ॥

भावार्थ : जो व्यक्ति धार्मिक प्रावॄत्ती का है वो परस्त्री को माते समान परद्रव्य को माटी समान तथा अन्य सभी प्रााणिमात्रोंको स्वयं के समान मानता है । यही धर्म के सही लक्षण है।


य: स्वभावो हि यस्यास्ति स नित्यं दुरतिक्रम: श्वा यदि क्रियते राजा तत् किं नाश्नात्युपानहम्

भावार्थ : जिसक जो स्वभाव होता है, वह हमेशा वैसाही रहता है। कुत्तेको अगर राजा भी बनाया जाए, तो वह अपनी जूतें चबानेकी आदत नही भूलता।


नात्युच्चशिखरो मेरुर्नातिनीचं रसातलम् व्यवसायद्वितीयानां नात्यपारो महोदधि:

भावार्थ : जो मनुष्य उद्योग का सहाय्य लेता है (अपने स्वयं के प्रयत्नोंपे निर्भर होता है), उसको पर्बत की चोटी उंची नही, पॄथ्वी का तल नीचा नही, और महासागर अनुल्लंघ्य नही।


दूर्जन: परिहर्तव्यो विद्ययाऽलङ्कॄतोऽपि सन् ।
मणिना भूषित: सर्प: किमसौ न भयङ्कर: ॥

भावार्थ : दूर्जन ,चाहे वह विद्यासे विभूषित क्यू न हो , उसे दूर रखना चाहिए । मणि से आभूषित संाँप, क्या भयानक नहीं होता।


सुखमापतितं सेव्यं दु:खमापतितं तथा ।
चक्रवत् परिवर्तन्ते दु:खानि च सुखानि च ॥

भावार्थ : जीवन में आनेवाले सुख का आनंद ले, , तथा दु:ख का भी स्वीकार करें । सुख और दु:ख तो एक के बाद एक चक्रवत आते रहते है।


अज्ञेभ्यो ग्रन्थिन: श्रेष्ठा: ग्रन्थिभ्यो धारिणो वरा: ।
धारिभ्यो ज्ञानिन: श्रेष्ठा: ज्ञानिभ्यो व्यसायिन: ॥

भावार्थ : निरक्षर लोगोंसे ग्रंथ पढनेवाले श्रेष्ठ । उनसे भी अधिक ग्रंथ समझनेवाले श्रेष्ठ । ग्रंथ समझनेवालोंसे भी अधिक आत्मज्ञानी श्रेष्ठ तथा उनसे भी अधिक ग्रंथ से प्रााप्त ज्ञान को उपयोग में लानेवाले श्रेष्ठ।


उभाभ्यामेव पक्षाभ्यां शथा खे पक्षिणां गति: ।
तथैव ज्ञानकर्मभ्यां जायते परमं पदम् ॥

भावार्थ : जिस तरह दो पंखो के आधार से पक्षी आकाश में उंचा उड सकता है उसी तरह ज्ञान तथा कर्म से मनुष्य परब्रह्म को प्रााप्त कर सकता है।


मनसा चिन्तितंकर्मं वचसा न प्रकाशयेत् ।
अन्यलक्षितकार्यस्य यत: सिद्धिर्न जायते ॥

भावार्थ : मनमे की हुई कार्य की योजना दुसरों को न बताये । दूसरें को उसकी जानकारी होने से कार्य सफल नही होता।


गतेर्भंग: स्वरो हीनो गात्रे स्वेदो महद्भयम् ।
मरणे यानि चि*नानि तानि चि*नानि याचके ॥

भावार्थ : चलते समय संतुलन खोना,बोलते समय आवाज न निकलना, पसीना छूटना और बहुत भयभीत होना यह मरनेवाले आदमी के लक्षण याचक के पास भी दिखते है।


शुश्रूषा श्रवणं चैव ग्रहणं धारणं तथा ।
उहापोहोर्थ विज्ञानं तत्वज्ञानं च धीगुणा: ॥

भावार्थ : श्रवण करने की इच्छा, प्रात्यक्ष में श्रवण करना, ग्रहण करना, स्मरण में रखना, तर्र्र्कवितर्क, सिद्धान्त निश्चय, अर्थज्ञान तथा तत्वज्ञान ये बुद्धी के आठ अंग है ।

द्वयक्षरस् तु भवेत् मॄत्युर् , त्रयक्षरमं ब्रा*म शाश्वतम् ।
‘मम’ इति च भवेत् मॄत्युर, ‘नमम’ इति च शाश्वतम् ॥

भावार्थ : महाभारत शांतिपर्व मॄत्यु यह दो अक्षरों का शब्द है तथा ब्रा*म जो शाश्वत है वह तीन अक्षरोंका है । ‘मम’ यह भी मॄत्यु के समानही दो अक्षरोंका शब्द है तथा ‘नमम’ यह शाश्वत ब्रा*म की तरह तीन अक्षरोंका शब्द है ।

रविरपि न दहति तादॄग् यादॄक् संदहति वालुकानिकर: अन्यस्माल्लब्धपदो नीच: प्रायेण दु:सहो भवति

भावार्थ : सुर्यप्रकाश से भी तपे हुए रेत का दाह अधिक होता है। (उसी तरह) दुसरों के सहाय्य से बडा हुआ नीच मनुष्य जादा उपद्रव देता है।

क्वचिद्भूमौ शय्या क्वचिदपि पर्यङ्कशयनं
क्वचिच्छाकाहारी क्वचिदपि च शाल्योदनरुचि:
क्वचित्कन्थाधारी क्वचिदपि च दिव्याम्बरधरो
मनस्वी कार्यार्थी न गणयति दु:खं न च सुखम्

भावार्थ : कभी धरतीपे सोना कभी पलंगपे। कभी सब्जी खाना कभी रोटी–चावल। कभी फटे हुए कपडे पहनना कभी बहौत कीमती कपडे पहनना। जो व्यक्ति अपने कार्यमे सर्वथा मग्न हो, उन्हे ऐसी बाहरी सुखदु:खोसे कोई मतलब नही होता।

रामो राजमणि: सदा विजयते रामं रमेशं भजे रामेणाभिहता निशाचरचमू रामाय तस्मै नम: रामान्नास्ति परायणं परतरं रामस्य दासोस्म्यहम् रामे चित्तलय: सदा भवतु मे भो राम मामुद्धर ॥

भावार्थ : राजशिरोमणि,,,,,,,, ,सदा विजयी होनेवाले रमापति राम की मै प्रार्थना करता हूँ । राक्षसों का नि:पात करनेवाले राम को नमस्कार । राम के अलावा कुछ अधिक महत्त्वपूर्ण नही , मै राम का दास हूँ । मेरा चित्त राममें लीन है , हे राम , मेरा उद्धार करो ॥ बुधकौशिक ऋषी विरचित रामरक्षास्तोत्र मे यह श्लोक है । इस श्लोक की विशेषता ये है कि , राम शब्द की सभी आठ विभक्तियों का इसमें प्रयोग किया है ।

मनोजवं मारूततुल्यवेगं जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठम् ।
वातात्मजं वानरयूथमुख्यं श्रीरामदूतं शरणं प्रपद्ये ॥

भावार्थ : रामरक्षामें से और एक श्लोक। मन और वायु के समान गतिमान , इन्द्र्र्र्रियों को जितने वाले जितेन्द्र्रिय , बुद्धिमानांे में वरिष्ठ , वानरों के मुख्य तथा श्रीराम के दूत अर्थात् , हनुमान को मै शरण जाता ह^ूंं

आचाराल्लभते ह्मयु: आचारादीप्सिता: प्राजा: ।
आचाराद्धनमक्षय्यम् आचारो हन्त्यलक्षणम् ॥

भावार्थ : अच्छे व्यवहार से दीर्घ आयु, श्रेष्ठ सन्तती, चिर समॄद्धी प्रााप्त होती है तथा अपने दोषोंका भी नाष होता है ।

शोचन्ति जामयो यत्र विनश्यत्याशु तत्कुलम् ।
यत्रैतास्तु न शोचन्ति ह्मप्रासीदन्ति) वर्धते तद्धि सर्वदा ॥

भावार्थ : जिस परिवार में स्त्री ह्ममाता, पत्नी, बहन, पुत्री) दु:खी रहती है उस परिवार का नाश होता है तथा जिस परिवार में वो सुखी रहती है वह परिवार समॄद्ध रहता है ।

अप्रकटीकॄतशक्ति: शक्तोपि जनस्तिरस्क्रियां लभते निवसन्नन्तर्दारुणि लङ्घ्यो व*िनर्न तु ज्वलित:

भावार्थ : बलवान पुरुष का बल जब तक वह नही दिखाता है, उसके बलकी उपेक्षा होती है। लकडी से कोई नही डरता, मगर वही लकडी जब जलने लगती है, तब लोग उससे डरते है।

विक्लवो वीर्यहीनो य: स दैवमनुवर्तते वीरा: संभावितात्मानो न दैवं पर्युपासते

भावार्थ : जिसे अपने आप पे भरोसा नही है ऐसा बलहीन पुरुष नसीब के भरोसे रहता है। बलशाली और स्वाभिमानी पुरुष नसीब का खयाल नहीं करता।

यथा वायुं समाश्रित्य वर्तन्ते सर्वजन्तव: ।
तथा गॄहस्थमाश्रित्य वर्तन्ते सर्व आश्रमा: ॥

भावार्थ : जिस प्राकार इस जगत में सभी का जीवन वायू पर निर्भर है उसी प्राकार मनुष्य जीवन के सभी आश्रम गॄहस्ताश्रम पर निर्भर है ।

नारीकेलसमाकारा _श्यन्तेपि हि सज्ज्ना: ।
अन्ये बदरिकाकाश बहिरेव मनोहर: ॥

भावार्थ : सज्ज्न लोग नारियल के समान होते हैर् परन्तू दुर्जन लोग बेर के समान होते हैर् केवल बाहर से मनोहर दिखते है पर अन्दर से तो यातनात्मक कठोर होते है ।

वॄत्तं यत्नेन संरक्षेद् वित्तमायाति याति च अक्षीणो वित्तत: क्षीणो वॄत्ततस्तु हतो हत:

भावार्थ : मनुष्य ने अपने शीलका संरक्षण प्रयत्नपुर्वक करना चाहिये (उसके धनका नही)। धन कमाया जा सकता है और गमाया भी जा सकता है। धनवान परन्तु शीलहीन मनुष्य मॄत के समान है।

तर्काे प्रतिष्ठ: श्रुतयो विभिन्ना
नैको मुनिर्यस्य वच: प्रमाणम्
धर्मस्य तत्त्वं निहितं गुहायां
महाजनो येन गत: स पन्था:

भावार्थ : तर्क बहौत चंचल होता है। हर श्रुति अलग आज्ञा देती है। हर ऋषी का मत भिन्न होता है, और कोइ भी एक ऋषी दुसरेसे जादा योग्य नही कह सकते। (ऐसेमे) महान व्यक्ती जिस पन्थ पे चलते है, वही सही रास्ता है।

सुखं शेते सत्यवक्ता सुखं शेते मितव्ययी ।
हितभुक् मितभुक् चैव तथैव विजितेन्द्रिय: ॥

भावार्थ : सत्य बोलनेवाला , मर्यादित खर्चा करनेवाला , हितकारक पदार्थ जरूरी प्रमाण मे खानेवाला , तथा जिसने इन्द्रियोंपर विजय पाया है , वह चैन की नींद सोता है ।

परित्यजेदर्थकामौ यौ स्यातां धर्मवर्जितौ ।
धर्मं चाप्यसुखोदर्कं लोकनिकॄष्टमेव च ॥

भावार्थ : मनु जो संपत्ती तथा मन की अभिलाषा धर्म के विपरित है उसका त्याग करना चाहिए । इतना ही नही तो उस धर्म का भी त्याग करना अनुचित नही होगा जो धर्म भविष्य में संकट उत्पन्न कर सकता है तथा जो किसी समाज के प्राति प्रातिकुल सिद्ध हो सकता है ।

श्रद्धाभक्तिसमायुक्ता नान्यकार्येषु लालसा: ।
वाग्यता: शुचयश्चैव श्रोतार: पुण्यशालिन: ॥

भावार्थ : योग्य श्रोता वही है जिन के पास श्रद्धा तथा भक्ति है, जिनका हेतू केवल ज्ञान प्रााप्त करना है और कुछ भी नही, तथा जिनका अपने वाणी पर नियंत्रण है और जो मन से शुद्ध है ।

भेदे गणा: विनश्येयु: भिन्नास्तु सुजया: परै: तस्मात् संघातयोगेन प्रयतेरन् गणा: सदा

भावार्थ : गणराज्य मे अगर एकता न हो तो वह नष्ट हो जाता है, क्योंकी एकता न होने पर शत्रु को उसे नष्ट करने मे आसानी होती है। इसिलिए गणराज्य हमेशा एक रहना चाहिये।

परवाच्येषु निपुण: सर्वो भवति सर्वदा आत्मवाच्यं न जानीते जानन्नपि च मुह्मति

भावार्थ : हर एक मनुष्य दुसरेके दोष दिखानेमे प्रविण होता है। अपने खुदके दोष या तो उसे नजर नही आते, या फिर वह उस दोषोंको अनदेखी करता है।

गौरवं प्राप्यते दानात् न तु वित्तस्य संचयात् ।
स्थिति: उच्चै: पयोदानां पयोधीनां अध: स्थिति: ॥

भावार्थ : दानसे गौरव प्राप्त होता है ,वित्तके संचयसे नहीं । जल देनेवाले बादलोंका स्थान उच्च है , बल्कि जलका समुच्चय करनेवाले सागर का स्थान नीचे है ।

न भूतपूर्व न कदापि वार्ता हेम्न: कुरङ्ग: न कदापि दॄष्ट: ।
तथापि तॄष्णा रघुनन्दनस्य विनाशकाले विपरीतबुद्धि: ॥

भावार्थ : न पहले कभी सुवर्णमॄग के बारे में सुना ,न कभी देखा फिरभी रघुनन्दन राम को लोभ हुआ । सचमुच , विनाशकाले विपरीतबुदधी ।

नारून्तुद: स्यादार्तोपि न परद्रोहकर्मधी: ।
ययास्योद्विजते वाचा नालोक्यां तामुदीरयेत् ॥

भावार्थ : दूसरोंसे दु:ख मिलने पर भी वह शांत रहे , विचार से या कॄती से भी वह दूसरों को दु:ख न दे , उस के मुख से ऐसी वाणी न निकले जिससे दूसरे दु:खी हो , सारांश में वह ऐसा कोइ काम न करे जिससे की वो स्वर्ग से वंचित हो ।

कर्पूरधूलिरचितालवाल: कस्तूरिकापंकनिमग्ननाल:, गंगाजलै: सिक्तसमूलवाल: स्वीयं गुणं मुञ्चति किं पलाण्डु:

भावार्थ : प्याज के पौधेके लिए आप कपूरकी क्यारी बनाओे, कस्तूरिका उपयोग मि+ी की जगह करो, अथवा उसके जडपे गंगाजल डालो वह अपनी दुर्गंध नही छोडेगा । मनुष्य का स्वभाव बदलना बहुत कठिन है ।

जलबिन्दुनिपातेन क्रमश: पूर्यते घट: स हेतु: सर्वविद्यानां धर्मस्य च धनस्य च

भावार्थ : जिस तरह बुन्द बुन्द पानीसे घडा भर जातहै, उसी तरह विद्या, धर्म, और धन का संचय होत है। सारांश, छोटे मात्रा मे होने पर भी इन तिनोंपे दुर्लक्ष नही करना चाहिये।

सेवक: स्वामिनं द्वेष्टि कॄपणं परुषाक्षरम् आत्मानं किं स न द्वेष्टि सेव्यासेव्यं न वेत्ति य:

भावार्थ : अगर मालिक कंजुस हो, और कठोर बोलने वाला हो, तो सेवक उसका द्वेश करता है|किसकी सेवा करनी चाहिये किसकी नही ये जिसे नही समझता,वह अपने आप का द्वेश क्यों नही करताÆ खुदको जो कष्ट होते है उसके लिए बाह्म कारण ढुंडना यह मनुष्य स्वभाव है| अपने उपर आने वाले आपत्ति का कारण जादातर अपने आपमेही ढुंढा जा सकता है।

ऐक्यं बलं समाजस्य तदभावे स दुर्बल: तस्मात ऐक्यं प्रशंसन्ति दॄढं राष्ट्र हितैषिण:

भावार्थ : एकता समाजका बल है , एकताहीन समाज दुर्बल है। इसलिए , राष्ट्रहित सोचनेवाले एकता को बढावा देते है ।

का त्वं बाले कान्चनमाला कस्या: पुत्री कनकलताया: ॥
हस्ते किं ते तालीपत्रं का वा रेखा क ख ग घ ॥

भावार्थ : बाला , तुम कौन हो ऋ कान्चनमाला किनकी पुत्री ? कनकलताकी हाथ में क्या है ? तालीपत्र क्या लिखा है ? क ख ग घ

अप्यब्धिपानान्महत: सुमेरून्मूलनादपि ।
अपि वहन्यशनात् साधो विषमश्चित्तनिग्रह: ॥

भावार्थ : अपने स्वयं के मन का स्वामी होना यह संपूर्ण सागर के जल को पिना, मेरू पर्वत को उखाडना या फिर अग्नी को खाना ऐसे असंभव बातों से भी कठिन है ।

अधीत्य चतुरो वेदान् सर्वशास्त्राण्यनेकश: ।
ब्रम्ह्मतत्वं न जानाति दर्वी सूपरसं यथा ॥

भावार्थ : सिर्फ वेद तथा शास्त्रों का बार बार अध्ययन करनेसे किसी को ब्राह्मतत्व का अर्थ नही होता । जैसे जिस चमच से खाद्य पदार्थ परोसा जाता है उसे उस खाद्य पदार्थ का गुण तथा सुगंध प्रााप्त नही होता ।

यस्य चित्तं निर्विषयं )दयं यस्य शीतलम् ।
तस्य मित्रं जगत्सर्वं तस्य मुक्ति: करस्थिता ।

भावार्थ : जिस का मन इंद्रियोंके वश में नही ह,ै जिस का )दय शांत है, संपूर्ण विश्व जिस का मित्र है ऐसे मनुष्य को मुक्ति सहजता से प्रााप्त होती है ।

अज्ञान तिमिरांधस्य ज्ञानांजन शलाकया चक्षुरुन्मिलितं येन तस्मै श्री गुरवे नम:

भावार्थ : अज्ञान के अंध:कारसे अन्धे हुए मनुष्यकी आंखे ज्ञानरुप अंजनसे खोलनेवाले गुरुको मेरा प्रणाम।

क्षमा शस्त्रं करे यस्य दुर्जन: किं करिष्यति ।
अतॄणे पतितो वन्हि: स्वयमेवोपशाम्यति ॥

भावार्थ : क्षमारूपी शस्त्र जिसके हाथ में हो , उसे दुर्जन क्या कर सकता है ? अग्नि , जब किसी जगह पर गिरता है जहाँ घास न हो , अपने आप बुझ जाता है ।

ग्रन्थानभ्यस्य मेघावी ज्ञान विज्ञानतत्पर: ।
पलालमिव धान्यार्थी त्यजेत् सर्वमशेषत: ॥

भावार्थ : बुद्धीमान मनुष्य जिसे ज्ञान प्रााप्त करने की तीव्र इच्छा है वह ग्रन्थो में जो महत्वपूर्ण विषय है उसे पढकर उस ग्रन्थका सार जान लेता है तथा उस ग्रन्थ के अनावष्यक बातों को छोड देता है उसी तरह जैसे किसान केवल धान्य उठाता है ।

असूयैकपदं मॄत्यु: अतिवाद: श्रियो वध: ।
अशुश्रूषा त्वरा श्लाघा विद्याया: शत्रवस्त्रय: ॥

भावार्थ : विद्यार्थी के संबंध में द्वेश यह मॄत्यु के समान है । अनावश्यक बाते करने से धन का नाश होता है । सेवा करने की मनोवॄत्ती का आभाव, जल्दबाजी तथा स्वयं की प्राशंसा स्वयं करना यह तीन बाते विद्या ग्रहण करने के शत्रू है ।

नालसा: प्राप्नुवन्त्यर्थान न शठा न च मायिन: न च लोकरवाद्भीता न च शश्वत्प्रतीक्षिण:

भावार्थ : आलसी मनुष्य कभीभी धन नही कमा सकता (वह अपने जीवनमे सफल नही हो सकता)| दुसरों की बुराई चाहने वाला तथा उनकी वंचना करने वाला, लोग क्या कहेंगे यह भय रखनेवाला, और अच्छे मौके के अपेक्षामे कॄतीहीन रहनेवाला भी धन नही कमा सकता।

दातव्यं भोक्तव्यं धनविषये संचयो न कर्तव्य: पश्येह मधुकरीणां संचितार्थ हरन्त्यन्ये

भावार्थ : दान कीजिए या उपभोग लीजिए , धन का संचय न करें देखिए , मधुमक्खी का संचय कोर्इ और ले जाता है ॥

या कुन्देन्दुतुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रावॄता , या वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना ।
या ब्रह्माच्युतशङ्करप्रभॄतिभिर्देवै: सदा वन्दिता , सा मां पातु सरस्वती भगवती नि:शेषजाड्यापहा ॥

भावार्थ : जो कुन्दपुष्प ,,, चंद्रमा या ,, जलबिन्दुओं के हार के समान धवल है , जिसने शुभ्रवस्त्र परिधान किए है , जिसके हाथ वीणा के दण्डसे सुशोभित है और श्वेतपद्म जिसका आसन है, जिसे ब्रह्मा , विष्णु , महेश आदि सदा वन्दन करते है , बुद्धी की जडता पूर्णत: नष्ट करनेवाली ऐसी भगवती सरस्वती मेरा रक्षण करें ।

कस्यचित् किमपि नो हरणीयं मर्मवाक्यमपि नोच्चरणीयम् श्रीपते: पदयुगं स्मरणीयं लीलया भवजलं तरणीयम्

भावार्थ : दुसरोंकी कोई वस्तु कभी चुरानी नही चाहिए। दुसरेके मर्मस्थानपे आघात हो ऐसा कभी बोलना नही चाहिए। श्री विष्णु के चरणका स्मरण करना चाहिए। ऐसा करनेसे भवसागर पार करना सरल हो जाता है।

बुधाग्रे न गुणान् ब्राूयात् साधु वेत्ति यत: स्वयम् मूर्खाग्रेपि च न ब्राूयाद्धुधप्रोक्तं न वेत्ति स:

भावार्थ : अपने गुण बुद्धीमान मनुष्य को न बताए| वह उन्हे अपने आप जान लेगा| अपने गुण बु_ु मनुष्य को भी न बताए| वह उन्हे समझ नही सकेगा।

के शवं पतितं दॄष्ट्वा पाण्डवा हर्षनिर्भरा: रूदन्ति कौरवा: सर्वे हा हा के शव के शव रूकिये , यदि आपने इस श्लोक का अर्थ समझने का प्रयास किया है ! संस्कॄतमे शब्दों का सही अर्थ समझना अत्यंत आवश्यक है !! यहाँ , के और शव अलग अलग शब्द है ।
˜क का अर्थ है पानी ह्म कर्इ अर्थाे में से एक ) इसलिए ‘के’ मतलब ˜पानी में| पाण्डव का एक अर्थ ˜मछली और कौरव का एक अर्थ ˜कौआ भी होता है। इसलिए , इस श्लोक का अर्थ है ,पानी में गिरा शव देखकर मछलीयाँं हर्षनिर्भर हुर्इ ह्मबल्कि) सब कौए ह्मदुखसे) चिल्लाने लगे ˜अरेरे पानी में शव’।

गुरोरप्यवलिप्तस्य कार्याकार्यमजानत: ।
उत्पथं प्रातिपन्नस्य न्याय्यं भवति शासनम् ॥

भावार्थ : आदरणीय तथा श्रेष्ठ व्यक्ति यदी व्यक्तीगत अभिमान के कारण धर्म और अधर्म में भेद करना भूल गए या फिर गलत मार्ग पर चले तो ऐसे व्यक्ति को शासन करना न्याय ही है ।

यद्यद् राघव संयाति महाजनसपर्यया ।
दिनं तदेव सालोकं श,,,,,,,ेषास्त्वन्धदिनालया: ॥

भावार्थ : हे! रघु वंशके वंशज , श्रेष्ठ तथा सज्जनों की सेवा में व्यतीत हुवा दिन ही प्रकाशमान होता है । अन्य सभी दिन सूर्य प्राकाश रहते हुए भी अंधकार के समान प्रातीत होते है ।

यमो वैवस्वतो राजा यस्तवैष )दि स्थित: ।
तेन चेदविवादस्ते मा गंगा मा कुरून् व्राज ॥

भावार्थ : यदि विवस्वत के पुत्र भगवान यम आपाके मन म्ंो बसते है तथा उनसे आपका मत भेद नही है तो आपको अपने पाप धोने परम पवित्र गंगा नदी के तट पर या कुरूओंके भूमी को जाने की कोइ आवश्यकता नही है ।

किम् कुलेन विशालेन विद्याहीनस्य देहिन: अकुलीनोऽपि विद्यावान् देवैरपि सुपूज्यते

भावार्थ : अच्छे कुलमे जन्मी हुई व्यक्ति अगर ज्ञानी न हो, तो (उसके अच्छे कुल का) क्या फायदा। ज्ञानी व्यक्ति अगर कुलीन न हो, तो भी, इश्वर भी उसकी पूजा करते है।

पत्रं नैव यदा करीरविटपे दोषो वसन्तस्य किम् ।
नोलूकोऽप्यवलोकते यदि दिवा सूर्यस्य किं दूषणम् ।
धारा नैव पतन्ति चातकमुखे मेघस्य किं दूषणम् ।
यत् पूर्वं विधिना ललाटलिखितं तन्मार्जितुं क: क्षम: ।।

भावार्थ : करीरवॄक्ष ह्म मरूभूमीमे आनेवाला पर्णहीन वॄक्ष ) को ह्मवसंतऋतू मे भी ) पन्ने नहीं आते है इसमें वसन्त का क्या दोष । उल्लू को दिन में नही दिखार्इ देता इसमें सूर्य का क्या दोष ।
ह्मजल ) धाराए चातक के चोंच में नहीं गिरी तो वह बादल का दोष कैसे । अर्थात् , विधी ने जो माथे पर लिखा है , उसे कौन बदल सकता है ।

यथा हि पथिक: कश्चित् छायामाश्रित्य तिष्ठति ।
विश्रम्य च पुनर्गच्छेत् तद्वद् भूतसमागम: ॥

भावार्थ : जिस प्राकार यात्रा करनेवाला पथिक थोडे समय वॄक्ष के नीचे विश्राम करने के बाद आगे निकल जाता है उसी समान अपने जीवन में अन्य मनुष्य थोडे समय के लिए उस वॄक्ष की तरह छांव देते है और फिर उनका साथ छूट जाता है । सुभाषित 310

न व्याधिर्न विषं नापत् तथा नाधिश्च भूतले खेदाय स्वशरीरस्थं मौख्र्यमेकम् यथा नॄणाम्

भावार्थ : इस जगतमे स्वयंकी मूर्खताही सब दु:खोंकी जड होति है| कोई व्याधि, विष, कोई आपत्ति तथा मानसिक व्याधि से उतना दु:ख नही होता।

न वध्यन्ते ह्मविश्वस्ता बलिभिर्दुर्बला अपि विश्वस्तास्त्वेव वध्यन्ते बलिनो दुर्बलैरपि

भावार्थ : दुर्बल मनुष्य विश्वसनीय न होने पर भी बलवान मनुष्य उसे मारता नही है। बलवान पुरुष विश्वसनीय होने पर भी दुर्बल मनुष्य उसे मारता ही है।

वने रणे शत्रुजलाग्निमध्ये ।
रक्षन्ति पुण्यानि पुराकॄतानि ॥

भावार्थ : जब हम जंगल के मध्य में या फिर रणक्षेत्र के मध्य में या फिर जल में या फिर अग्नी में फस जाते है तब अपने भूतकाल के अच्छे कर्म ही हम को बचाते है ।

यदीच्छसि वशीकर्तुंं जगदेकेन कर्मणा ।
परापवादससेभ्यो गां चरन्तीं निवारय ॥

भावार्थ : यदी किसी एक काम से आपको जग को वश करना है तो परनिन्दारूपी धान के खेत में चरनेवाली जिव्हारूपी गाय को वहाँं से हकाल दो अर्थात दुसरे की निन्दा कभी न करो| संस्कॄत मे गौ: शब्द के अनेक अर्थ है| ; सुभाषितकार ने गौ: के दो अर्थ ह्मइन्द्रिय जिव्हेन्द्रिय तथा गाय) लेकर शब्द का सुन्दर उपयोग किया है।

गुरूशुश्रूषया विद्या पुष्कलेन धनेन वा ।
अथवा विद्यया विद्या चतुर्थो न उपलभ्यते ॥

भावार्थ : गुरूकी सेवा करने से या भरपूर धन देने से विद्या प्राप्त कर सकते है अथवा एक विद्या का दुसरी विद्या के साथ विनिमय कर सकते है ,ह्मविद्या प्राप्त करने का) चौथा कोर्इ रास्ता उपलब्ध नहीं है।

यथा खनन् खनित्रेण नरो वार्यधिगच्छति तथा गुरुगतं विद्यां शुश्रूषुरधिगच्छति

भावार्थ : भूमिमे पहार से गड्डा करनेवाले को जिस तरह पानी मिलता है, उसी तरह गुरु की सेवा करनेवालेको विद्या प्राप्त होती है।

यदि सन्ति गुणा: पुंसां विकसन्त्येव ते स्वयम् न हि कस्तूरिकामोद: शपथेन विभाव्यते

भावार्थ : मनुष्यके गुण अपने आप फैलते है, बताने नही पडते| (जिसतरह), कस्तूरी का गंध सिद्ध नही करना पडता।

यथा काष्ठं च काष्ठं च समेयातां महोदधौ ।
समेत्य च व्यपेयातां तद्वद् भूतसमागम: ॥

भावार्थ : जैसे लकडी के दो टुकडे विशाल सागर में मिलते है तथा एक ही लहर से अलग हो जाते है उसी तरह दो व्य्क्ति कुछ क्षणों के लिए सहवास में आते है फिर कालचक्र की गती से अलग हो जाते है ।

यस्यास्ति वित्तं स नर:कुलीन: , स पण्डित: स श्रुतवान् गुणज्ञ: ।
स एव वक्ता स च दर्शनीय: , सर्वे गुणा: काञ्चनमाश्रयन्ते ॥

भावार्थ : जिसके पास धन है वही कुलीन ह्मकहलाता है वही पण्डित , बहुश्रुत , गुणोंकी पहचान रखनेवाला , वक्ता तथा दर्शनीय समझा जाता है| अर्थात , सभी गुण धन का आश्रय लेते है।

यद्धात्रा निजभालपट्टलिखितं स्तोकं महद् वा धनम् तत् प्राप्नोति मरूस्थलेऽपि नितरां मेरौ ततो नाधिकम् तद्धीरो भव , वित्तवत्सु कॄपणां वॄत्तिं वॄथा मा कॄथा: कूपे पश्य पयोनिधावपि घटो गॄह्णाति तुल्यं पय:

भावार्थ : विधाताने ललाटपर जो थोडा या अधिक धन लिखा है , वो मरूभूमी मे भी मिलेगा| मेरू पर्वत पर जाकर भी उससे ज्यादा नहीं मिलेगा। धीरज रखो , अमीरोंके सामने दैन्य ना दिखाओ , देखो यह गागर कुआँ या सागर में से उतनाही पानी ले सकती है

नाम्भोधिरर्थितामेति सदाम्भोभिश्च पूर्यते ।
आत्मा तु पात्रतां नेय: पात्रमायान्ति संपद: ॥

भावार्थ : विदुरनीति सागर कभी जल के लिए भिक्षा नही मांगता फिर भी वह सदैव जल से भरा रहता है । यदि हम अपने आप को योग्य बना दे तो सब साधन स्वयंही अपने पास चली आएंगी

बहीव्मपि संहितां भाषमाण: न तत्करोति भवति नर: प्रामत्त: ।
गोप इव गा गणयन् परेषां न भाग्यवान् श्रामण्यस्य भवति ॥

भावार्थ : यदि मनुष्य बहूत से धार्मिक श्लोक स्मरण में भी रखे पर उस प्राकार आचरण न करे तो उस का कोइ लाभ नही है । जैसे गाय चरानेवाला गौवोंकी संख्या तो जानता है पर वह उस का मालिक नही रहता ।

वने रणे Xात्रुजलाग्निमध्ये महार्णवे पर्वतमस्तके वा ।
सुप्तं प्रमत्तं विषमस्थितं वा रक्षन्ति पुण्यानि पुरा कॄतानि ॥

भावार्थ : अरण्यमे रणभूमी में , शत्रुसमुदाय में , जल , अग्नि , महासागर या पर्वतशिखरपर तथा सोते हुए , उन्मत्त स्थिती में या प्रतिकूल परिस्थिती में मनुष्यके पूर्वपुण्य उसकी रक्षा करतें हैं ।

न कालो दण्डमुद्यम्य शिर: कॄन्तति कस्यचित् ।
कालस्य बलमेतावत् विपरीतार्थदर्शनम् ॥

भावार्थ : काल किसी का शस्त्र से शिरच्छेद नही करता पर वह बुद्धीभेद करता है जिससे मनुष्य को गलत रास्ता ही सही लगता है और वह अपने विनाश की ओर बढता है । बुद्धीभेद ही काल का बल है ।

संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम् ।
देवा भागं यथा पूर्वे सञ्जानाना उपासते ॥

भावार्थ : हम सब एक साथ चले; एक साथ बोले; हमारे मन एक हो । प्रााचीन समय में देवताओं का ऐसा आचरण रहा इसी कारण वे वंदनीय है ।

मध्विव मन्यते बालो यावत् पापं न पच्यते ।
यदा च पच्यते पापं दु:खं चाथ निगच्छति धम्मपद 5|6

भावार्थ : जब तक पाप संपूर्ण रूप से फलित नही होता तब तक वह पाप कर्म मधुर लगता है ।परन्तु पूर्णत: फलित होने के पश्च्यात मनुष्य को उसके कटु परिणाम सहन करने ही पडते है ।

तावज्जितेन्द्रियो न स्याद् विजितान्येन्द्रिय: पुमान् ।
न जयेद् रसनं यावद् जितं सर्वं जिते रसे ॥

भावार्थ : जब तक मनुष्य अपने विविध आहार के उपर स्वनियंत्रण नही रखता तब तक उसने सब इन्द्रियों के उपर विजय पायी है ऐसा नही बोल सकते । आहार के उपर स्वनियंत्रण यही सब से आवश्यक बात है ।

द्वावेव चिन्तया मुक्तौ परमानन्द आप्लुतौ ।
यो विमुग्धो जडो बालो यो गुणेभ्य: परं गत: ॥

भावार्थ : इस जगत में केवल दो प्राकार के लोग परमआनन्द का अनुभव कर सकते है । एक है नन्हासा बालक तथा दुसरा है परम योगी ।

न तथा तप्यते विद्ध: पुमान् बाणै: सुमर्मगै: ।
यथा तुदन्ति मर्मस्था ह्मसतां पुरूषेषव: ॥

भावार्थ : मनुष्य के शरीर में लगे बाण उतनी वेदना नही देते जितनी वेदना कठोर शब्द देते है ।

न कश्चिदपि जानाति किं कस्य श्वो भविष्यति अत: श्व: करणीयानि कुर्यादद्यैव बुद्धिमान ॥

भावार्थ : कल किसका क्या होगा कोर्इ नहीं जानता , इसलिए बुद्धिमान लोग कल का काम आजही करते है ।

वयमिह परितुष्टा वल्कलैस्त्वं दुकूलै: सम इह परितोषो निर्विशेषो विशेष: ।
स तु भवति दरिद्रो यस्य तॄष्णा विशाला मनसि च परितुष्टे कोऽर्थवान को दरिद्र: ॥

भावार्थ : एक योगी राजा से कहता है , œ हम यहाँ है ह्म आश्रममे ) वल्कलवस्त्रसे भी सन्तुष्ट , जब कि तुमने अपने रेशीमवस्त्र पहने है । हम उतने ही सन्तुष्ट है , कोर्इ भेद नही है ।
जिसकी पिपासा अधिक , वही दरिद्री है । जब की मन में सन्तुष्टता है , दरिद्री कौन और धनवान कौन ?

न ह्मम्मयानि तीर्थानि न देवा मॄच्छिलामया: ।
ते पुनन्त्युरूकालेन दर्शनादेव साधव: ॥

भावार्थ : नदीयों का पवित्र जल या भगवान की मूर्ती के दर्शन मात्र से भक्त का मन शुद्ध नही होता अपितु लंबे समय ध्यान लगाने के बाद ही अंत:करण शुद्ध होता है । परन्तू संतों के केवल दर्शन मात्र से ही हम पवित्र हो जाते है ।

ब्राम्हण: सम_क् शान्तो दीनानां समुपेक्षक: ।
स्त्रवते ब्रम्ह तस्यापि भिन्नभाण्डात् पयो यथा ॥

भावार्थ : समदॄष्टी के अभाव के कारण यदि ब्राम्हण किसी पिडीत व्यक्ति की सहायता नही करता तो उसका ब्रम्हत्व समाप्त हो गया ऐसा समझना चाहिए ।

दैवमेवेह चेत् कतर्ॄ पुंस: किमिव चेष्टया ।
स्नानदानासनोच्चारान् दैवमेव करिष्यति ॥

भावार्थ : अगर नसीबही आपका कार्य करनेवाला है तो आपको कुछ करनेकी क्या आवष्यकता है ? स्नान दानधर्म बैठना बोलना यह सभी आपका नसीबही करेगा ! सुभाषित 334

कार्यमण्वपि काले तु कॄतमेत्युपकारताम् ।
महदप्युपकारोऽपि रिक्ततामेत्यकालत: ॥

भावार्थ : किसीका छोटासाभी काम अगर सही समयपे करे तो वह उपकारक होता है । परंतु अगर गलत समयपे करे तो बहुत बडा काम भी किसी काम का नही होता है । सुभाषित 335

यो यमर्थं प्रार्थयते यदर्थं घटतेऽपि च ।
अवश्यं तदवाप्नोति न चेच्छ्रान्तो निवर्तते ॥

भावार्थ : कोर्इ मनुष्य अगर कुछ चाहता है और उसकेलिए अथक प्रयत्न करता है तो वह उसे प्राप्त करकेही रहता है ।

यदजर््िातं प्राणहरै: परिश्रमै: मॄतस्य तद् वै विभजन्ति रिक्थिन: ।
कॄतं च यद् दुष्कॄतमर्थलिप्सया तदेव दोषापहतस्य कौतुकम् ॥

भावार्थ : प्राणान्तिक परिश्रमों से प्राप्त किया हुआ मॄत आदमी का जो धन होता है , उसके वारिस वह आपसमें बाँंट लेते है । उस धन के लोभ से उसने जो पाप बटोरा है वह पापी मनुष्य के साथही जाता है ह्मउसेही पापके परिणाम भुगतने पडते है ,पाप का कोर्इ विभाजन नहीं होता) ।

त्यजेत् क्षुधार्ता जननी स्वपुत्रं , खादेत् क्षुधार्ता भुजगी स्वमण्डम् ।
बुभुक्षित: किं न करोति पापं , क्षीणा जना निष्करूणा भवन्ति ॥

भावार्थ : भूख से व्याकूल माता अपने पुत्रका त्याग करेगी भूख से व्याकूल साँप अपने अण्डे खा लेगा भूखा क्या पाप नहीं कर सकता ? भूख से क्षीण लोग निर्दय बन जाते हैं ।

अणुभ्यश्च महद्भ्यश्च शास्त्रेभ्य: कुशलो नर: ।
सर्वत: सारमादद्यात् पुष्पेभ्य इव षट्पद: ॥

भभावार्थ : वरा जैसे छोटे बडे सभी फूलोमेसे केवल मधु इक{ा करता है उसी तरह चतुर मनुष्यने शास्त्रोमेसे केवल उनका सार लेना चाहिए । सुभाषित 339

न अन्नोदकसमं दानं न तिथिद्र्वादशीसमा ।
न गायत्रया: परो मन्त्रो न मातु: परदैवतम् ॥

भावार्थ : अन्नदान जैसे दान नही है । द्वादशी जैसे पवित्र तिथी नही है । गायत्री मन्त्र सर्वश्रेष्ठ मन्त्र है तथा माता सब देवताओंसेभी श्रेष्ठ है ।

यत्र नार्य: तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता: ।
यत्र एता: तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्र अफला: क्रिया: ॥

भावार्थ : मनुस्मॄति जहां स्त्रीयोंको मान दिया जाता है तथा उनकी पूजा होती है वहां देवताओंका निवास रहता है । परन्तू जहां स्त्रीयोंकी निंदा होती है तथा उनका सम्मान नही किया जाता वहां कोइ भी कार्य सफल नही होता ।

वनेऽपि सिंहा मॄगमांसभक्षिणो बुभुक्षिता नैव तॄणं चरन्ति ।
एवं कुलीना व्यसनाभिभूता न नीचकर्माणि समाचरन्ति ॥

भावार्थ : जंगल मे मांस खानेवाले शेर भूक लगने पर भी जिस तरह घास नही खाते, उस तरह उच्च कुल मे जन्मे हुए व्यक्ति (सुसंस्कारित व्यक्ति) संकट काल मे भी नीच काम नही करते ।

खद्योतो द्योतते तावद् यवन्नोदयते शशी ।
उदिते तु सहस्रांशौ न खद्योतो न चन्द्रमा: ॥

भावार्थ : जब तक चन्द्रमा उगता नही, जुगनु (भी) चमकता है । परन्तु जब सुरज उगता है तब जुगनु भी नही होता तथा चन्द्रमा भी नही (दोनो सुरज के सामने फीके पडते है)

स्वभावं न जहात्येव साधुरापद्गतोऽपि सन् ।
कर्पूर: पावकस्पॄष्ट: सौरभं लभतेतराम् ॥

भावार्थ : अच्छी व्यक्ति आपत्काल में भी अपना स्वभाव नहीं छोडती है , कर्पूर अग्निके स्पर्श से अधिक खुशबू निर्माण करता है

चित्त्स्य शुद्धये कर्म न तु वस्तूपलब्धये ।
वस्तुसिद्धिर्विचारेण न किंचित्कर्मेकोटिभि: ॥

भावार्थ : विवेकचूडामणी अंत:करण के शुद्धी के लिए कर्म ह,ै पारमार्थिक ज्ञान प्रााप्त करने के लिए नही । पारमार्थिक ज्ञान तो चिंतन तथा विचार करने से ही प्रााप्त होता ह,ै कोटि कर्म करने से नही ।

श्रमेण दु:खं यत्किन्चिकार्यकालेनुभूयते ।
कालेन स्मर्यमाणं तत् प्रामोद ॥

भावार्थ : काम करते समय होनेवाले कष्ट के कारण थोडा दु:ख तो होता है । परन्तु भविष्य में उस काम का स्मरण हुवा तो निश्चित ही आनंद होता है ।

आस्ते भग आसीनस्य }ध्र्वम् तिष्ठति तिष्ठत: ।
शेते निषद्यमानस्य चरति चरतो भग: ॥

भावार्थ : जो मनुश्य (कुछ काम किए बिना) बैठता है, उसका भाग्य भी बैठता है । जो खडा रहता है, उसका भाग्य भी खडा रहता है । जो सोता है उसका भाग्य भी सोता है और जो चलने लगता है, उसका भाग्य भी चलने लगता है । अर्थात कर्मसेही भाग्य बदलता है ।

विपदी धैर्यमथाभ्युदये क्षमा सदसि वाक्पटुता युधि विक्रम: ।
यशसि चाभिरूचिव्र्यसनं श्रुतौ प्रकॄतिसिद्धमिदं हि महात्मनाम् ॥

भावार्थ : आपात्काल मे धेेैर्य , अभ्युदय मे क्षमा , सदन मे वाक्पटुता , युद्ध के समय बहादुरी , यशमे अभिरूचि , ज्ञान का व्यसन ये सब चीजे महापुरूषोंमे नैसर्गिक रूपसे पायी जाती हैं । सुभाषित 348

यावत् भ्रियेत जठरं तावत् सत्वं हि देहीनाम् ।
अधिकं योभिमन्येत स स्तेनो दण्डमर्हति ॥

भावार्थ : मनुस्मॄती, महाभारत अपने स्वयम के पोषण के लिए जितना धन आवश्यक है उतने पर ही अपना अधिकार है । यदि इससे अधिक पर हमने अपना अधिकार जमाया तो यह सामाजिक अपराध है तथा हम दण्ड के पात्र है ।

अहं च त्वं च राजेन्द्र लोकनाथौ उभावपि ।
बहुव्रीहिरहं राजन् षष्ठीतत्पुरूषो भवान ॥

भावार्थ : एक भिखारी राजा से कहता है, “हे राजन्, , मै और आप दोनों लोकनाथ है ।ह्मबस फर्क इतना है कि) मै बहुव्रीही समास हंूँ तो आप षष्ठी तत्पुरूष हो !”

यदा न कुरूते भावं सर्वभूतेष्वमंगलम् ।
समदॄष्टेस्तदा पुंस: सर्वा: सुखमया दिश: ॥

भावार्थ : जो मनुष्य किसी भी जीव के प्राती अमंगल भावना नही रखता,, जो मनुष्य सभी की ओर सम्यक् दॄष्टीसे देखता है, ऐसे मनुष्य को सब ओर सुख ही सुख है ।

शरदि न वर्षति गर्जति वर्षति वर्षासु नि:स्वनो मेघ: नीचो वदति न कुरुते न वदति सुजन: करोत्येव

भावार्थ : शरद ऋतुमे बादल केवल गरजते है, बरसते नही|वर्षा ऋतुमै बरसते है, गरजते नही। नीच मनुश्य केवल बोलता है, कुछ करता नही|परन्तु सज्जन करता है, बोलता नही।

सर्वार्थसंभवो देहो जनित: पोषितो यत: ।
न तयोर्याति निर्वेशं पित्रोर्मत्र्य: शतायुषा ॥

भावार्थ : एक सौ वर्ष की आयु प्रााप्त हुआ मनुष्य देह भी अपने माता पिता के ऋणोंसे मुक्त नही होता । जो देह चार पुरूषार्थोंकी प्रााप्ती का प्रामुख साधन ह,ै उसका निर्माण तथा पोषण जिन के कारण हुआ है, उनके ऋण से मुक्त होना असंभव है ।

अमॄतं चैव मॄत्युश्च द्वयं देहप्रातिष्ठितम् ।
मोहादापद्यते मॄत्यु: सत्येनापद्यतेऽमॄतम् ॥

भावार्थ : मॄत्यु तथा अमरत्व दोनों एक ही देह में निवास करती है । मोह के पिछे भागनेसे मॄत्यु आती है तथा सत्य के पिछे चलनेसे अमरत्व प्रााप्त होता है ।

परिवर्तिनि संसारे मॄत: को वा न जायते ।
स जातो येन जातेन याति वंश: समुन्न्तिम् ॥

भावार्थ : नितीशतक 32 इस जीवन मॄत्यु के अखंडीत चक्र में जिस की मॄत्यु होती ह,ै क्या उसका पुन: जन्म नही होता? परन्तु उसीका जन्म, जन्म होता है जिससे उसके कुल का गौरव बढता है ।

को न याति वशं लोके मुखे पिण्डेन पूरित: मॄदंगो मुखलेपेन करोति मधुरध्वनिम्

भावार्थ : मुख खाद्य से भरकर किसको अंकीत नहि किया जा सकता। आटा लगानेसे मॄदुंग भी मधुर ध्वनि निकालता है।

सर्वनाशे समुत्पन्ने ह्मर्धं त्यजति पण्डित: अर्धेन कुरुते कार्यं सर्वनाशो हि दु:सह:

भावार्थ : जब सर्वनाश निकट आता है, तब बुद्धिमान मनुष्य अपने पास जो कुछ है उसका आधा गवानेकी तैयारी रखता है| आधेसे भी काम चलाया जा सकता है, परंतु सबकुछ गवाना बहुत दु:खदायक होता है।

गुणेषु क्रियतां यत्न: किमाटोपै: प्रयोजनम् विक्रीयन्ते न घण्टाभि: गाव: क्षीरविवर्जिता:

भावार्थ : स्वयं मे अच्छे गुणों की वॄद्धी करनी चहिए| दिखावा करके लाभ नही होता। दुध न देनेवाली गाय उसके गलेमे लटकी हुअी घंटी बजानेसे बेची नही जा सकती।

साहित्यसंगीतकलाविहीन: साक्षात् पशु: पुच्छविषाणहीन: ।
तॄणं न खादन्नपि जीवमान: तद्भागधेयं परमं पशूनाम् ॥

भावार्थ : नीतिशतक जिस व्यक्ती को कला संगीत में रूची नही है वह तो केवल पूंछ तथा सिंग रहीत पशू है । यह तो पशूओंका सौभाग्य है की वह घास नही खाता!

न प्रा)ष्यति सम्माने नापमाने च कुप्यति ।
न क्रुद्ध: परूषं ब्रूयात् स वै साधूत्तम: स्मॄत: ॥

भावार्थ : संत तो वही है जो मान देने पर हर्षित नही होता अपमान होने पर क्रोधीत नही होता तथा स्वयं क्रोधीत होने पर कठोर शब्द नही बोलता ।

असभ्दि: शपथेनोक्तं जले लिखितमक्षरम् ।
सभ्दिस्तु लीलया प्राोक्तं शिलालिखितमक्षरम् ॥

भावार्थ : दुर्जनोने ली हुइ शपथ भी पानी के उपर लिखे हुए अक्षरों जैसे क्षणभंगूर ही होती है । परन्तू संतो जैसे व्यक्तिने सहज रूप से बोला हुआ वाक्य भी शिला के उपर लिखा हुआ जैसे रहता है । सुभाषित 361

आरोप्यते शिला शैले यत्नेन महता यथा ।
पात्यते तु क्षणेनाधस्तथात्मा गुणदोषयो: ॥

भावार्थ : शिला को पर्वत के उपर ले जाना कठिन कार्य है परन्तू पर्वत के उपर से नीचे ढकेलना तो बहुत ही सुलभ है । ऐसे ही मनुष्य को सद्गुणोसे युक्त करना कठिन है पर उसे दुर्गुणों से भरना तो सुलभही है ।

लुब्धमर्थेन गॄ*णीयात् क्रुद्धमञ्जलिकर्मणा मूर्खं छन्दानुवॄत्त्या च तत्वार्थेन च पण्डितम्

भावार्थ : लालचि मनुष्यको धन (का लालच) देकर वश किया जा सकता है। क्रोधित व्यक्तिके साथ नम्र भाव रखकर उसे वश किया जा सकता है। मूर्ख मनुष्य को उसके इछानुरुप बर्ताव कर वश कर सकते है। तथ ज्ञानि व्यक्ति को मुलभूत तत्व बताकर वश कर सकते है।

अधर्मेणैथते पूर्व ततो भद्राणि पश्यति ।
तत: सपत्नान् जयति समूलस्तु विनश्यति ॥

भावार्थ : कुटिलता व अधर्म से मानव क्षणिक समॄद्वि व संपन्नता पाता है । अच्छा दैवका अनुभव भी करता है । शत्रु को भी जीत लेता है । परन्तू अन्त मे उसका विनाश निश्चित है । वह जड समेत नष्ट होता है ।

विद्या मित्रं प्रावासेषु भार्या मित्रं गॄहेषु च ।
व्याधितस्योषधं मित्रं धर्मो मित्रं मॄतस्य च ॥

भावार्थ : विद्या प्रावास के समय मित्र है । पत्नी अपने घर मे मित्र है । व्याधी ग्रस्त शरीर को औषधी मित्र है तथा मॄत्यु के पश्च्यात धर्म अपना मित्र है ।

रूपयौवनसंपन्ना: विशालकुलसंभवा: ।
विद्याहीना: न शोभन्ते निर्गन्धा: किंशुका: इव ॥

नरपतिहितकर्ता द्वेष्यतां याति लोके जनपदहितकर्ता त्यज्यते पार्थिवेन इति महति विरोधे विद्यमाने समाने नॄपतिजनपदानां दुर्लभ: कार्यकर्ता

भावार्थ : राजाका कल्याण करनेवालेका लोग द्वेश करते है। लोगोंका कल्याण करनेवालेको राजा त्याग देता है। इस तरह दोनो ओर से बडा विरोध होते हुए भी राजा और प्रजा दोनोका कल्याण करनेवाला मनुष्य दुर्लभ होता है।

दीपो नाशयते ध्वांतं धनारोग्ये प्रयच्छति कल्याणाय भवति एव दीपज्योतिर्नमोऽस्तुते

भावार्थ : दीया अंध:कार का नाश करता है और आरोग्य तथा धन देता है। सबके कल्याण करने वाले दीयेको मेरा प्रणाम

तत् कर्म यत् न बन्धाय सा विद्या या विमुक्तये ।
आयासाय अपरं कर्म विद्या अन्या शिल्पनैपुणम् ॥

भावार्थ : जिस कर्म से मनुष्य बन्धन में नही बन्ध जाता वही सच्चा कर्म है । जो मुक्ति का कारण बनती है वही सच्ची विद्या है । शेष कर्म तो कष्ट का ही कारण होती है तथा अन्य प्राकार की विद्या तो केवल नैपुण्ययुक्त कारागिरी है ।

अक्षरद्वयम् अभ्यस्तं नास्ति नास्ति इति यत् पुरा ।
तद् इदं देहि देहि इति विपरीतम् उपस्थितम्

भावार्थ : संपत्ती के परमोच्च शिखर पर यदि मनुष्य ने याचक को नही नही कहा तो निश्चितही भविष्य में ऐसे मनुष्य को दिजीए दिजीए ऐसे कहनेकी परिस्थिती नियती ले आएगी ।

अन्यक्षेत्रे कॄतं पापं पुण्यक्षेत्रे विनश्यति ।
पुण्यक्षेत्रे कॄतं पापं वज्रलेपो भविष्यति ॥

भावार्थ : अन्यक्षेत्र में किए पाप पुण्य क्षेत्र में धुल जाते है । पर पुण्य क्षेत्र में किए पाप तो वज्रलेप की तरह होते है र् अक्षमस्व ।

असारे खलु संसारे सारं श्वशुरमन्दिरम् ।
हरो हिमालये शेते हरि: शेते महोदधौ ॥

भावार्थ : इस सारहीन जगत में केवल श्वशुर का घर रहने योग्य है । इसी कारण शंकर भगवान हिमालय में रहते है तथा विष्णू भगवान समुद्र में रहते है ।

एकेन अपि सुपुत्रेण सिंही स्वपिति निर्भयम् ।
सह एव दशभि: पुत्रै: भारं वहति गर्दभी ॥

भावार्थ : सिंहीन को यदि एक छावा भी है तो भी वह आराम करती है क्योंकी उसका छावा उसे भक्ष्य लाकर देता है । परन्तु गधी को दस बच्चे होने परभी स्वयं भार का वहन करना पडता है ।

आचार: प्रथमो धर्म: अित्येतद् विदुषां वच: तस्माद् रक्षेत् सदाचारं प्राणेभ्योऽपि विशेषत:

भावार्थ : अच्छा बर्ताव रखना यह सबसे जादा महात्त्वपूर्ण है ऐसा पंडीतोने कहा इसलिए अपने प्राणोका मोल देके भी अच्छाा बर्ताव रखना चाहिए।

न तथा शीतलसलिलं न चन्दनरसो न शीतला छाया ।
प्र*लादयति पुरूषं यथा मधुरभाषिणी वाणी ॥

भावार्थ : शीतल जल चंदन अथवा छाया किसी में भी इतनी शीतलता नही होती जितनी के मधुर वणी में होती है ।

न मर्षयन्ति चात्मानं संभावयितुमात्मना ।
अदर्शयित्वा शूरास्तू कर्म कुर्वन्ति दुष्करम् ॥

भावार्थ : शूर जनों को अपने मुख से अपनी प्राशंसा करना सहन नहीं होता । वे वाणी के द्वारा प्रादर्शन न करके दुष्कर कर्म ही करते है ।

चलन्तु गिरय: कामं युगान्तपवनाहता: ।
कॄच्छे्रपि न चलत्येव धीराणां निश्चलं मन: ॥

भावार्थ : युगान्तकालीन वायु के झोंकों से पर्वत भले ही चलने लगें परन्तु धैर्यवान् पुरूषों के निश्चल )दय किसी भी संकट में नहीं डगमगाते ।

मनस्येकं वचस्येकं कर्मण्येकं महात्मनाम् ।
मनस्यन्यत् वचस्यन्यत् कर्मण्यन्यत् दुरात्मनाम्

भावार्थ : महान व्यक्तियों के मनमे जो विचार होता है वही वे बोलते है और वही कॄतिमेभी लाते है| उसके विपारित नीच लोगोंके मनमे एक होता है वै बोलते दुसरा है और करते तिसरा है।

जीवने यावदादानं स्यात्,,, प्रदानं ततोऽधिकम् ।
इतयेषा प्रार्थनाऽस्माकं भगवन्परिपूर्यताम्

भावार्थ : हमारे जीवन में हमारी याचनाओं से अधीक हमारा दान हो यह एक प्रार्थना हे भगवन् तुम पूरी करदो।

सत्यं माता पिता ज्ञानं धर्मो भ्राता दया सखा ।
शान्ति: पत्नी क्षमा पुत्र: षडेते मम बान्धवा: ॥

भावार्थ : सत्य मेरी माता, ज्ञान मेरे पिता, धर्म मेरा बन्धु, दया मेरा सखा, शान्ति मेरी पत्नी तथा क्षमा मेरा पुत्र है ।यह सब मेरे रिश्तेदार है ।

न अहं जानामि केयुरे, नाहं जानामि कुण्डले ।
नूपुरे तु अभिजानामि नित्यं पादाभिवन्दनात् ॥

भावार्थ : रावण जब बलपुर्वक सीता माता को ले जा रहा था तभी सीता माता ने अपने कुछ आभरण इस आशासे गिराए थे की श्रीराम उन्हे देखकर उन तक पहुंच सके ।

यही आभरण लक्ष्मण को श्रीराम ने पहचाननेके लिए कहा ।
तब लक्ष्मण ने कहार् “ मैं इन कुण्डलों तथा बाजूबंद को तो नही पहचान सकता ।
परन्तु नित्य उनके चरण स्पर्श करते रहने कारण यह नुपूर उनकेही है यह मैं निश्चयसे कह सकता हूं ।
“ सुभाषित 382

तद् ब्रूहि वचनं देवि ,राज्ञ: यद् अभिकांक्षितम् ।
करिष्ये प्रतिजाने च , रामो द्विर् न अभिभाषते ॥

भावार्थ : रामायण अयोध्या सर्ग 18|30 भरत का राज्याभिषेक व श्रीराम को वनवास यह वर राजा दशरथ से पाकर , कैकेयी श्रीराम को कहती है की राजा दशरथ अप्रीय वार्ता सुनाने के इच्छुक नही हैं ।
इसलिये यदि श्रीराम राजा कि इच्छानुसार करेंगे तो ही माता कैकयी उन्हे वह वर्ता सुनायेंगी ।
यह सुनके श्रीराम कहते है , “राजा के आज्ञा पर मै अग्नी प्रव्ेाशभी कर सकताहु ।
मै प्रतिज्ञा करता हुं, जो राजा कहेंगे मै वही करूंगा” ।
श्रीराम दोबार वचन नही देते थे ।
श्रीराम एक एकवचनी थे ।

तिष्ठेत् लोको विना सूर्यं सस्यमं वा सलिलं विना ।
न हि रामं विना देहे तिष्ठेत् तु मम जीवितम् ॥

भावार्थ : कैकेयी जब राजा दशरथ से श्रीराम को वनवास भेजनेका वर मांगती है तब राजा दशरथ कहते है की हो सकता है के सूर्य के बिना सॄष्टी टीकी रहे या पानी के बिना धान्य विकसीत हो ।
पर श्रीराम के बिना इस देह में प्रााण रहना असंभव है । भविष्य में राजा दशरथ की यह बात सिद्ध हुइ ।

दूरस्था: पर्वता: रम्या: वेश्या: च मुखमण्डने ।
युध्यस्य तु कथा रम्या त्रीणि रम्याणि दूरत: ॥

भावार्थ : पहाड दूर से बहुत अच्छे दिखते है । मुख विभुषित करने के बाद वैश्या भी अच्छी दिखती है । युद्ध की कहानिया सुनने को बहौत अच्छी लगती है । ये तिनो चिजे पर्याप्त अंतर रखने से ही अच्छी लगती है ।

उपाध्यात् दश आचार्य: आचार्याणां शतं पिता ।
सहस्रं तु पितॄन् माता गौरवेण अतिरिच्यते ॥

भावार्थ : आचार्य उपाध्यायसे दस गुना श्रेष्ठ होते है । पिता सौ आचार्याें के समान होते है । माता पितासे हजार गुना श्रेष्ठ होती है ।

आर्ता देवान् नमस्यन्ति, तप: कुर्वन्ति रोगिण: ।
निर्धना: दानम् इच्छन्ति, वॄद्धा नारी पतिव्रता ॥

भावार्थ : संकट में लोग भगवान की प्राार्थना करते है, रोगी व्यक्ति तप करने की चेष्टा करता है । निर्धन को दान करने की इच्छा होती है तथा वॄद्ध स्त्री पतिव्रता होती है । लोग केवल परिस्थिती के कारण अच्छे गुण धारण करने का नाटक करते है ।

शोको नाशयते धैर्य, शोको नाशयते श्रॄतम् ।
शोको नाशयते सर्वं, नास्ति शोकसमो रिपु: ॥

भावार्थ : शोक धैर्य को नष्ट करता है, शोक ज्ञान को नष्ट करता है, शोक सर्वस्व का नाश करता है । इस लिए शोक जैसा कोइ शत्रू नही है ।

भीष्मद्रोणतटा जयद्रथजला गान्धारनीलोत्पला ।
शल्यग्राहवती कॄपेण महता कर्णेन वेलाकुला ॥
अश्वत्थामविकर्णघोरमकरा दुर्योधनावर्तिनी ।
सोत्तीर्णा खलु पाण्डवै: रणनदी कैवर्तक: केशव: ॥

भावार्थ : भीष्म और द्रोण जिसके दो तट है जयद्रथ जिसका जल है शकुनि ही जिसमें नीलकमल है शल्य जलचर ग्राह है कर्ण तथा कॄपाचार्य ने जिसकी मर्यादा को आकुल कर डाला है अश्वत्थामा और विकर्ण जिस के घोर मगर है ऐसी भयंकर और दुर्योधन रूपी भंवर से युक्त रणनदी को केवल श्रीकॄष्ण रूपी नाविक की सहायता से पाण्डव पार कर गये ।

श्रिय: प्रसूते विपद: रुणद्धि, यशांसि दुग्धे मलिनं प्रमार्ष्टि ।
संस्कार सौधेन परं पुनीते, शुद्धा हि बुद्धि: किलकामधेनु: ॥

भावार्थ : शुद्ध बुद्धि निश्चय ही कामधेनु जैसी है क्योंकि वह धन-धान्य पैदा करती है; आने वाली आफतों से बचाती है; यश और कीर्ति रूपी दूध से मलिनता को धो डालती है; और दूसरों को अपने पवित्र संस्कारों से पवित्र करती है। इस तरह विद्या सभी गुणों से परिपूर्ण है।